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भारत में साल के ज्यादातर महीने धूप खिली रहती है, फिर भी 90 फीसदी लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। सवाल सिर्फ सेहत का नहीं, हमारी बदलती जिंदगी का भी है

देहरादून। जिस देश में सूरज लगभग हर दिन बिना नागा उगता हो, जहां गर्मियों में लोग धूप से बचने के लिए छांव तलाशते हों, उसी देश में अगर 70 से 90 फीसदी लोगों के शरीर में विटामिन डी की कमी पाई जाए तो यह सिर्फ एक मेडिकल रिपोर्ट नहीं, हमारी जीवनशैली की रिपोर्ट भी है।
जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर समेत कई शोध बताते हैं कि भारत के अधिकांश लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। यह वही विटामिन है जो हड्डियों को मजबूत बनाता है, मांसपेशियों को ताकत देता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर करता है और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। सवाल है कि धूप की कोई कमी नहीं, फिर विटामिन डी की इतनी बड़ी कमी क्यों? शायद जवाब हमारे घरों, दफ्तरों और मोबाइल स्क्रीन में छिपा है। सुबह से शाम तक लाखों लोग बंद कमरों में काम कर रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम हो या ऑफिस की नौकरी, जिंदगी का बड़ा हिस्सा अब एयर-कंडीशंड कमरों में गुजरता है। धूप बाहर खड़ी रहती है और हम भीतर बैठे रहते हैं। जब बाहर निकलते भी हैं तो सनस्क्रीन, छाते और पूरे शरीर को ढक लेने वाले कपड़े धूप की उन किरणों को त्वचा तक पहुंचने से रोक देते हैं, जिनकी मदद से शरीर विटामिन डी बनाता है। ऊपर से शहरों का प्रदूषण भी इस प्राकृतिक प्रक्रिया में बाधा बन रहा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि भारतीयों की सांवली त्वचा में मेलेनिन की मात्रा अधिक होती है। यह हमें हानिकारक किरणों से बचाती है, लेकिन विटामिन डी बनने की रफ्तार भी धीमी कर देती है। यानी धूप वही है, लेकिन शरीर तक उसका असर उतनी आसानी से नहीं पहुंचता। विटामिन डी की कमी के लक्षण अक्सर इतने सामान्य होते हैं कि लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। लगातार थकान, सुस्ती, पीठ या शरीर में दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी और बार-बार संक्रमण होना इसके संकेत हो सकते हैं। धीरे-धीरे यह कमी हड्डियों को कमजोर करने लगती है। अंडे की जर्दी, फैटी फिश, मशरूम और फोर्टिफाइड दूध जैसे खाद्य पदार्थों में विटामिन डी मिलता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल खानपान के भरोसे इसकी बड़ी कमी को पूरा करना आसान नहीं है।
धूप से विटामिन डी बनना भी सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि बाहर कितना सूरज निकला है। दिन का समय, उम्र, त्वचा का रंग, खुली त्वचा का हिस्सा और जीवनशैली सबकी भूमिका होती है।
इसलिए यह खबर सिर्फ विटामिन डी की नहीं है। यह उस जीवनशैली की खबर है जिसमें हम सूरज वाले देश में रहते हुए भी सूरज से दूर होते जा रहे हैं। शायद हमें अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ मिनट निकालकर फिर से खुले आसमान के नीचे बैठने की जरूरत है। क्योंकि कई बार दवा की दुकान से पहले इलाज धूप में मिल जाती है।

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