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हल्द्वानी। राजनीति में कद और क्षेत्र की समस्याओं के बीच का फासला कभी-कभी बहुत कुछ कह जाता है। बंशीधर भगत उत्तराखंड की राजनीति का जाना-पहचाना नाम हैं। चार दशक से अधिक का राजनीतिक सफर, छह बार विधायक रहने का अनुभव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री जैसे पद यह सब उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा है। लेकिन कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र की एक सड़क इस पहचान के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर रही है। वार्ड संख्या 40 कांतीपुरम और हिम्मतपुर मल्ला में शहीद मेजर कमलेश पाण्डे के नाम पर बनी सड़क आज बदहाली से गुजर रही है। सड़क पर गड्ढे हैं, मरम्मत अधूरी है और बरसात में पानी भरने से लोगों की परेशानी बढ़ रही है। यह वही रास्ता है जहां से बच्चे स्कूल जाते हैं, बुजुर्ग गुजरते हैं और स्थानीय लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए निकलते हैं। क्योकि य़ह सवाल सड़क का नहीं, व्यवस्था का है। अगर एक वरिष्ठ विधायक के क्षेत्र में भी एक सड़क की मरम्मत के लिए लोगों को बार-बार गुहार लगानी पड़े, तो फिर आम जनता की समस्याओं का क्या होगा? क्या विभागीय अधिकारी अपने काम के प्रति उतने ही गंभीर हैं, जितनी अपेक्षा जनता उनसे करती है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पेयजल पाइपलाइन डालने के दौरान सड़क खोदी गई थी। काम पूरा होने के बाद सड़क को उसी हालत में छोड़ दिया गया। अब जिम्मेदारी तय करने वाला कोई स्पष्ट चेहरा नजर नहीं आ रहा। विभाग एक-दूसरे की ओर देख रहे हैं और जनता टूटी सड़क पर चलने को मजबूर है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि जनप्रतिनिधि की छवि से भी जुड़ा प्रश्न है। बंशीधर भगत जैसे अनुभवी नेता के क्षेत्र में अगर विकास कार्यों की निगरानी कमजोर दिखाई देती है, तो इसका राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है। जनता यह पूछ सकती है कि जब एक वरिष्ठ विधायक की मौजूदगी और प्रभाव भी अधिकारियों को समय पर काम पूरा कराने के लिए पर्याप्त दबाव नहीं बना पा रहा, तो आम नागरिक अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए किसके पास जाए? अधिकारियों के लिए भी यह सवाल है कि क्या उनकी जवाबदेही सिर्फ फाइलों तक सीमित है या जमीन पर दिखाई देने वाले कामों तक भी है? एक सड़क की हालत किसी सरकार के बड़े विकास दावों की परीक्षा बन सकती है।

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2027 के विधानसभा चुनाव करीब आते जा रहे हैं। ऐसे समय में सड़क, पानी, सफाई और स्थानीय सुविधाओं जैसे मुद्दे जनता की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रहेंगे। राजनीति में बड़े नामों की परीक्षा अक्सर बड़े मंचों पर नहीं, बल्कि ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान से होती है। फिलहाल सवाल यही है शहीद के नाम की सड़क कब सुधरेगी? और उससे भी बड़ा सवाल इस लापरवाही की जिम्मेदारी आखिर किस अधिकारी की तय होगी? क्योंकि जनता को सिर्फ आश्वासन नहीं, काम चाहिए।

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