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देहरादून की एक घटना, लेकिन सवाल पूरे सिस्टम से

देहरादून के राजकीय पॉलिटेक्निक पित्थूवाला में जो हुआ, वह सिर्फ एक छात्र के नकल करते पकड़े जाने की घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें नियम आम लोगों के लिए होते हैं और रसूख वाले लोग अक्सर खुद को नियमों से ऊपर समझने लगते हैं। एक परीक्षा कक्ष में नकल पकड़ी जाती है। परीक्षा ड्यूटी पर तैनात शिक्षक अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं। लेकिन इसके बाद जो घटनाक्रम सामने आता है, वह शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक संस्कृति और सत्ता के मनोविज्ञान पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
बताया गया कि 4 जून को परीक्षा के दौरान उपनिरीक्षक महेश कंडवाल के पुत्र कबीर कंडवाल को नकल करते हुए पकड़ा गया। परीक्षा नियंत्रक समिति ने नियमानुसार कार्रवाई की। कहा जा रहा है कि घटना सीसीटीवी कैमरों में भी रिकॉर्ड हुई। यहां तक मामला सीधा था। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे संस्थानों में नियम लागू होने के बाद भी नियम बच पाते हैं? क्योंकि अगले दिन जो हुआ, उसने पूरे मामले को एक अलग दिशा दे दी। आरोप है कि 5 जून को उपनिरीक्षक महेश कंडवाल अपने रिश्तेदारों के साथ कॉलेज पहुंचे और वहां शिक्षकों तथा कर्मचारियों के साथ अभद्रता और मारपीट की।
अगर ये आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का व्यवहार नहीं होगा। यह उस मानसिकता का प्रदर्शन होगा जिसमें सरकारी पद को सेवा नहीं, शक्ति समझ लिया जाता है। देश के छोटे-बड़े संस्थानों में अक्सर शिक्षक, डॉक्टर, कर्मचारी और अधिकारी इसी दबाव का सामना करते हैं। कई बार वे नियम लागू करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें ही धमकियों, दबाव और मुकदमों का सामना करना पड़ता है। एक शिक्षक परीक्षा में नकल रोकता है।
वह अपना कर्तव्य निभाता है। लेकिन अगर उसके बाद उसे मारपीट, गाली-गलौज या मुकदमे का सामना करना पड़े, तो यह सिर्फ उस शिक्षक का मामला नहीं रह जाता। यह पूरे शिक्षा तंत्र के मनोबल का प्रश्न बन जाता है।

देशभर के लाखों शिक्षक पहले ही संसाधनों की कमी, प्रशासनिक दबाव और सामाजिक उपेक्षा से जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता बचाने वाले लोग ही असुरक्षित महसूस करने लगें, तो शिक्षा व्यवस्था का क्या होगा?
इस मामले में केवल एक पक्ष नहीं है। उपनिरीक्षक महेश कंडवाल ने भी शिकायत दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि उनके बेटे के साथ परीक्षा के दौरान मारपीट हुई, उसे बंधक बनाया गया और धमकियां दी गईं। लोकतंत्र में न्याय का आधार यही है कि हर पक्ष को सुना जाए। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकता है। पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच हो।

देहरादून के एसएसपी प्रमेंद्र डोबाल ने उपनिरीक्षक महेश कंडवाल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबन किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना नहीं होता। यह जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया प्रशासनिक कदम होता है। लेकिन इस कार्रवाई का एक प्रतीकात्मक महत्व भी है।
यह संदेश है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी अपने पद की गरिमा के विपरीत आचरण करता है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है। देश में हर परीक्षा के दौरान लाखों छात्र ईमानदारी से मेहनत करते हैं। वे रात-रात भर पढ़ते हैं। परिवार उम्मीदें बांधता है। भविष्य दांव पर होता है। ऐसे में यदि कोई छात्र नकल करता है और उसके बचाव में प्रभाव, पद या दबाव का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सिर्फ परीक्षा नियमों का उल्लंघन नहीं होता। यह उन लाखों मेहनती छात्रों के साथ अन्याय होता है जो नियमों का पालन करते हैं।
राजकीय पॉलिटेक्निक पित्थूवाला की घटना अब केवल एक
एफआईआर या निलंबन का मामला नहीं रह गई है। अब परीक्षा इस बात की है कि क्या जांच निष्पक्ष होगी? क्या शिक्षकों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी? क्या पुलिस अपने ही अधिकारी के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई करेगी? क्या कानून सभी के लिए समान साबित होगा? क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी नकल उत्तर पुस्तिका में नहीं होती। सबसे बड़ी नकल तब होती है जब ताकतवर लोग कानून से ऊपर खड़े होने की कोशिश करते हैं और व्यवस्था बराबरी का अभिनय करने लगती है। देहरादून की इस घटना में अब सिर्फ एक छात्र या एक उपनिरीक्षक नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम कठघरे में खड़ा दिखाई देता है। और जनता इंतजार कर रही है कि इस परीक्षा में आखिर पास कौन होता है।

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