
देहरादून/रामनगर। सरकारी फाइलों की एक खास आदत होती है। वे कभी पूरी तरह बंद नहीं होतीं। वे अलमारी में रखी रहती हैं, धूल खाती रहती हैं, लेकिन जैसे ही कोई नया दस्तावेज सामने आता है, पुरानी फाइल फिर खुल जाती है। उत्तराखंड वन विकास निगम में शेर सिंह का मामला कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। करीब एक वर्ष पहले हमने विस्तार से बताया था कि कथित नियमविरुद्ध प्रोन्नतियों के मामले में शासन, कैबिनेट और राज्यपाल स्तर तक सवाल उठे, लेकिन शेर सिंह की पदस्थिति को लेकर स्थिति जस की तस बनी रही। तब सवाल यह था कि यदि शासन के आदेश अंतिम हैं, तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ?
अब उसी शेर सिंह के नाम के साथ एक और फाइल सामने आई है। इस बार मामला प्रोन्नति का नहीं, बल्कि ज्वालावन वन क्षेत्र में करोड़ों रुपये के सरकारी वन संसाधनों की सुरक्षा, कथित लापरवाही, लकड़ी चोरी, अवैध पातन और विभागीय जवाबदेही का है।
सरकारी पत्रों को पढ़िए तो लगता है जैसे किसी थ्रिलर फिल्म की पटकथा हो। एक के बाद एक पत्र। निरीक्षण रिपोर्ट। व्हाट्सएप पर मिली सूचना। जंगल में छिपी ट्रैक्टर-ट्रॉली। चिप्स बनाने की मशीन। वन तस्करों द्वारा कर्मचारियों से मारपीट। लकड़ी से भरी ट्रॉली का गायब होना। संयुक्त निरीक्षण। करोड़ों की सरकारी संपत्ति पर सवाल। और इन सबके बीच बार-बार सामने आता एक नाम तत्कालीन प्रभागीय लॉगिंग प्रबंधक शेर सिंह। दस्तावेज बताते हैं कि 13 मई 2023 को क्षेत्रीय प्रबंधक हरिश पाल ने ज्वालावन क्षेत्र की लॉट संख्या 80, 81 और 83 का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान लॉट संख्या 81 के पास झाड़ियों में एक ट्रैक्टर-ट्रॉली, लकड़ी काटने का कटर और चिप्स बनाने की मशीन छिपी मिली। यह कोई सामान्य दृश्य नहीं था। मौके पर ही निर्देश दिए गए कि मशीन और ट्रॉली को वन विभाग के सुपुर्द किया जाए तथा संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण लकड़ी का ढुलान तत्काल पूरा कराया जाए। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड कहता है कि ऐसा समय पर नहीं हुआ। इसके बाद घटनाएं रुकने के बजाय बढ़ती चली गईं।
18 जून को सूचना आती है कि वन तस्करों ने कर्मचारियों से मारपीट की और लकड़ी से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर फरार हो गए। सूचना इतनी गंभीर थी कि व्हाट्सएप संदेश के आधार पर अधिकारियों को तत्काल निरीक्षण करना पड़ा। फिर 23 जून आता है। रामनगर के शिवलालपुर चुंगी के पास यूकेलिप्टिस की लकड़ी से भरी एक ट्रैक्टर-ट्रॉली पकड़ी जाती है। जांच शुरू होती है। विभागीय दस्तावेजों के अनुसार प्रथम दृष्टया लॉट में तैनात स्केलर किशन सिंह भंडारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है। उन्हें निलंबित कर दिया जाता है। सेक्शन अधिकारी विनोद कुमार को कारण बताओ नोटिस जारी होता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वन विभाग और वन विकास निगम के संयुक्त निरीक्षण में ज्वालावन से लगे प्लॉटों में 137 पेड़ों का अवैध पातन दर्ज किया जाता है। इसके बाद वन विभाग निगम पर 27 लाख 18 हजार 48 रुपये की पीडी (क्षतिपूर्ति) आरोपित कर देता है। इसी दौरान एक अन्य लॉट संख्या 34 में बिना छपे 13 खैर के पेड़ों के अवैध कटान पर 5 लाख 80 हजार 282 रुपये की अलग पीडी लगती है। दोनों मामलों को जोड़िए तो कुल राशि बनती है 32 लाख 98 हजार 330 रुपये। यानी सरकारी दस्तावेजों के अनुसार लगभग 33 लाख रुपये की जवाबदेही।
यहीं से सवाल सीधे शेर सिंह तक पहुंचते हैं। कारण बताओ नोटिस में कहा गया है कि यह सब उस अवधि का मामला है जब शेर सिंह पूर्वी रामनगर में प्रभागीय लॉगिंग प्रबंधक थे। नोटिस में आरोप है कि उन्होंने संवेदनशील क्षेत्र में समय पर ढुलान नहीं कराया, अनुभवी कर्मचारियों के बजाय नवनियुक्त स्केलरों की तैनाती की, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं की, लगातार भेजे गए पत्रों का समुचित जवाब नहीं दिया और ऐसी परिस्थितियां बनीं जिनमें चोरी तथा अवैध पातन की घटनाएं होती रहीं। यही नहीं, नोटिस में यह भी दर्ज है कि शेर सिंह 13 मई 2023 को बिना पूर्व सूचना कार्यालय से अनुपस्थित पाए गए थे, जबकि उनके पास दो महत्वपूर्ण प्रभागों का अतिरिक्त कार्यभार भी था। एक लेखा प्रबंधक की शिकायत का भी उल्लेख है, जिसमें भुगतान संबंधी विवाद के दौरान कथित रूप से अमर्यादित भाषा और दबाव बनाने की बात कही गई है।
सबसे दिलचस्प हिस्सा वह है, जहां विभाग खुद सवाल पूछ रहा है यदि उत्तराखंड वन विकास निगम को 32.98 लाख रुपये की पीडी जमा करनी पड़ती है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
यह कोई पत्रकार का सवाल नहीं है। यह विभाग के आधिकारिक कारण बताओ नोटिस में दर्ज प्रश्न है। अब यहां कहानी एक बार फिर उसी मोड़ पर आ जाती है, जहां एक साल पहले खड़ी थी।
तब सवाल था प्रोन्नति के आदेशों का पालन क्यों नहीं हुआ? आज सवाल है यदि इतने गंभीर आरोप हैं, तो अब तक अंतिम कार्रवाई कहां तक पहुंची? क्या विभागीय जांच पूरी हो चुकी है? क्या शेर सिंह ने अपना स्पष्टीकरण दे दिया है? क्या आरोप सिद्ध हुए? यदि नहीं हुए, तो मामला लंबित क्यों है? यदि हुए, तो कार्रवाई क्या हुई? सरकारी व्यवस्था में अक्सर कहा जाता है कि जांच चल रही है। लेकिन जनता के मन में अब दूसरा सवाल है क्या हर बड़ी फाइल का अंतिम पड़ाव जांच जारी है ही होता है? इस पूरे प्रकरण में एक बात साफ दिखाई देती है। जंगल से लकड़ी गायब होने की खबर सिर्फ जंगल की खबर नहीं होती। वह सरकारी निगरानी, प्रशासनिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक धन की सुरक्षा की भी खबर होती है। क्योंकि यहां सवाल केवल पेड़ों का नहीं है। यही सवाल उन दस्तावेजों का भी है, जिनमें एक के बाद एक अधिकारी लिखते रहे कि स्थिति गंभीर है, तत्काल कार्रवाई की जाए, संयुक्त निरीक्षण हो, जवाब दिया जाए, जिम्मेदारी तय की जाए। अब देखना यह होगा कि यह फाइल भी पिछली फाइलों की तरह सिर्फ पत्राचार बनकर रह जाती है या इस बार विभाग अपने ही दस्तावेजों में उठाए गए सवालों का जवाब भी तलाशता है।
