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तीन साल में विशेष अदालतों में लंबित केस 368 से बढ़कर 506 पहुंचे, निपटारे की रफ्तार धीमी, नए मुकदमों की संख्या लगातार जारी, सरकार के दावों और अदालतों के आंकड़ों में दिख रहा बड़ा अंतर

काशीपुर। उत्तराखंड सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा कर रही है, लेकिन अदालतों के आंकड़े एक अलग तस्वीर सामने रख रहे हैं। राज्य में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों के निस्तारण की गति इतनी धीमी है कि लंबित मुकदमों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2023 की शुरुआत में उत्तराखंड की भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित तीन विशेष अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 368 थी। दिसंबर 2025 तक यह संख्या बढ़कर 506 पहुंच गई। यानी करीब तीन वर्षों में भ्रष्टाचार के लंबित मामलों में 138 मामलों की बढ़ोतरी हुई।
यह खुलासा सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन को उत्तराखंड हाईकोर्ट से मिली सूचना से हुआ है।
काशीपुर निवासी आरटीआई कार्यकर्ता नदीम उद्दीन ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के लोक सूचना अधिकारी से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े विशेष न्यायालयों में लंबित और निस्तारित मामलों की जानकारी मांगी थी। हाईकोर्ट के राज्य लोक सूचना अधिकारी/ज्वाइंट रजिस्ट्रार एचएस जीना की ओर से उपलब्ध कराई गई सूचना के अनुसार, 31 दिसंबर 2025 तक राज्य की तीन भ्रष्टाचार निवारण विशेष अदालतों में कुल 506 मामले लंबित थे। इनमें सीबीआई विशेष न्यायालय, देहरादून में 64 मामले लंबित हैं। विशेष न्यायाधीश एंटी करप्शन (विजिलेंस), देहरादून में 248 मामले लंबित हैं। द्वितीय अपर जिला जज एंटी करप्शन, हल्द्वानी में 194 मामले लंबित हैं।
आंकड़े बताते हैं कि भ्रष्टाचार के नए मामले दर्ज होने की तुलना में उनके निपटारे की गति काफी कम रही। वर्ष 2023 के शुरुआत में लंबित मामले 368, नए दर्ज मामले 98 है जबकि इसमें से निस्तारित मामले की संख्या 33 है। वर्ष समाप्ति पर लंबित मामले 433, वर्ष 2024 नए दर्ज मामले 79, निस्तारित मामले की संख्या 32 जबकि लंबित मामले बढ़कर 480 हुए। वर्ष 2025 में नए दर्ज मामले 48, निस्तारित मामले 22 जबकि लंबित मामले बढ़कर 506 हुए। आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि अदालतों में मामलों का भार कम होने के बजाय लगातार बढ़ रहा है। भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का दबाव केवल निचली अदालतों तक सीमित नहीं है। हाईकोर्ट में भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। वर्ष 2023 की शुरुआत में हाईकोर्ट में ऐसे 226 मामले लंबित थे। इनमें 183 अपील, 16 रिवीजन, धारा 482 के तहत 27 विविध प्रार्थना पत्र शामिल थे। वर्ष 2023 के अंत तक यह संख्या बढ़कर 249 हो गई। वर्ष 2024 के अंत में हाईकोर्ट में भ्रष्टाचार संबंधी लंबित मामलों की संख्या 294 तक पहुंच गई। इनमें अपील, रिवीजन, धारा 482 और अन्य प्रार्थना पत्र शामिल थे। वर्ष 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में लंबित मामलों की संख्या कुछ घटकर 290 हुई, लेकिन बड़ी संख्या में मामले अभी भी न्यायालय में विचाराधीन हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई का दावा करने वाली सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इन मामलों के समयबद्ध निस्तारण की है। भ्रष्टाचार के मुकदमों में देरी का सीधा असर न्याय प्रक्रिया पर पड़ता है। लंबित मामलों के कारण आरोपी और शिकायतकर्ता दोनों वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करते रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मुकदमे दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। प्रभावी जांच, मजबूत अभियोजन और अदालतों में समय पर सुनवाई सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। आरटीआई कार्यकर्ता नदीम उद्दीन का कहना है कि सरकारी दावों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए न्यायालयों के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। लंबित मामलों में लगातार वृद्धि यह संकेत देती है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मुकदमों के निपटारे के लिए व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की जरूरत है।

अब सवाल यह है कि उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल कार्रवाई तक सीमित रहेगी या फिर मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए भी ठोस व्यवस्था बनाई जाएगी?

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