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उत्तराखंड वन विकास निगम में करोड़ों का वेतन खेल?, एसीपी, प्रमोशन और ग्रेड पे पर उठे गंभीर सवाल,सीएजी की जांच शुरू

देहरादून: जब नियम किताबों में रह जाएं और फैसले फाइलों में बदल दिए जाएं, तब सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ खजाने का नहीं, व्यवस्था के भरोसे का होता है।
उत्तराखंड वन विकास निगम एक बार फिर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के कारण चर्चा में है। इस बार मामला किसी खरीद, ठेके या टेंडर का नहीं, बल्कि अधिकारियों के वेतन निर्धारण (एसीपी), ग्रेड पे, पदोन्नति और करोड़ों रुपये के एरियर भुगतान से जुड़ा है।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों की शिकायत के बाद भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के अधीन प्रधान महालेखाकार (लेखापरीक्षा), उत्तराखंड ने जांच प्रक्रिया शुरू करते हुए 23 जून 2026 को उत्तराखंड वन विकास निगम से विस्तृत अभिलेख और नियमावली तलब कर ली है। यह केवल एक विभागीय जांच नहीं है। सवाल यह है कि क्या सरकारी नियमों को दरकिनार कर कुछ अधिकारियों को करोड़ों रुपये का लाभ पहुंचाया गया? और यदि हां, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
शिकायत के अनुसार उत्तराखंड वन विकास निगम के फील्ड संवर्ग में पदों का क्रम में सहायक लॉगिंग अधिकारी का ग्रेड पे 2800 रुपये, उप लॉगिंग अधिकारी का ग्रेड पे 4200 रुपये, लॉगिंग अधिकारी का ग्रेड पे 5400 रुपये, प्रभागीय लॉगिंग प्रबंधक का ग्रेड पे 6600 रुपये, क्षेत्रीय प्रबंधक का ग्रेड पे 8700 रुपये (चयन/ सलेक्शन का पद) है। यहीं से पूरा विवाद शुरू होता है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि एसीपी (सुनिश्चित करियर प्रगति) के तहत केवल पदोन्नति वाले पदों का वित्तीय लाभ दिया जा सकता है। इसलिए सहायक लॉगिंग अधिकारी को क्रमशः 4200, 5400 और 6600 ग्रेड पे तक ही तृतीय एसीपी मिलनी चाहिए थी।
यदि किसी कारण संवर्ग का विलय (विलयन) माना भी जाए, तब भी तीसरी एसीपी ग्रेड पे 7600 तक ही सीमित होनी चाहिए थी, क्योंकि 8700 ग्रेड पे वाला क्षेत्रीय प्रबंधक का पद चयन (चयन) का पद है, सामान्य पदोन्नति का नहीं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि तत्कालीन प्रबंध निदेशक ने बिना उत्तराखंड शासन के वित्त विभाग की स्वीकृति के अपने पसंदीदा अधिकारियों को ग्रेड पे 8700 (लेवल-13) का लाभ दे दिया। यदि यह आरोप सही पाया जाता है, तो इसका अर्थ यह होगा कि चयन के पद का लाभ एसीपी के माध्यम से दिया गया। वित्त विभाग की स्वीकृति नहीं ली गई। सेवा नियमावली की अनदेखी की गई और सरकारी खजाने पर भारी आर्थिक बोझ डाला गया।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार लगभग 60 अधिकारियों को इसका लाभ मिला। प्रत्येक अधिकारी को लगभग 50 लाख रुपये तक का एरियर दिया गया।
मासिक वेतन में लगभग 50 हजार से 80 हजार रुपये तक की वृद्धि हुई। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार निगम को लगभग 50 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ। और यह नुकसान आज भी जारी है क्योंकि बढ़ा हुआ वेतन अब भी दिया जा रहा है। इन आंकड़ों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी। प्रधान महालेखाकार (लेखापरीक्षा), उत्तराखंड द्वारा भेजे गए पत्र में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मांगे गए हैं। इनमें प्रमुख हैं जिनमें वित्त विभाग की स्वीकृति, शासनादेश, सेवा नियमावली, भर्ती एवं पदोन्नति नियम, एसीपी संबंधी आदेश, डीपीसी की कार्यवाही, वेतन निर्धारण पत्रक, एरियर भुगतान का पूरा विवरण, सेवा पुस्तिकाएं, क्षेत्रीय प्रबंधक पद पर नियुक्ति का कानूनी आधार, उच्च न्यायालय के आदेशों की प्रतियां। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि ग्रेड पे 8700 देने का निर्णय लिया गया, तो उसका विधिक आधार क्या था? क्योंकि शिकायत का सबसे गंभीर आरोप इसी बिंदु पर केंद्रित है। दावा किया गया है कि जब क्षेत्रीय प्रबंधक के पद पर नियुक्ति हुई, तब इसे सलेक्शन पोस्ट बताया गया। अर्थात वरिष्ठ अधिकारी को छोड़कर कनिष्ठ अधिकारी का चयन किया गया। लेकिन जब एसीपी देने की बारी आई, तब उसी पद को पदोन्नति का पद मानकर उच्च वेतनमान दे दिया गया। यदि जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है, तो यह दो अलग-अलग परिस्थितियों में एक ही पद की दो अलग-अलग व्याख्या का मामला बन सकता है। शिकायत में तत्कालीन प्रमुख सचिव (वित्त) अमित नेगी के कार्यकाल में जारी शासनादेशों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि वित्त विभाग ने इस संवर्ग के संबंध में पहले ही स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे। आरोप है कि बाद में इन निर्देशों की अनदेखी करते हुए लाभ दिए गए। इस पहलू की भी जांच की जा रही है। शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच हो। गलत वेतन निर्धारण की समीक्षा की जाए।
सरकारी धन की क्षति का आकलन हो। दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए। और यदि आवश्यक हो तो प्रकरण की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि मामले को लेकर प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव तथा अन्य अधिकारियों को भी पूर्व में पत्र भेजे जा चुके हैं। यदि नियम यही थे कि एसीपी केवल पदोन्नति वाले पद तक सीमित है, तो फिर चयन वाले पद का वेतनमान किस आधार पर दिया गया? यदि वित्त विभाग की स्वीकृति थी, तो वह सार्वजनिक क्यों नहीं है? यदि स्वीकृति नहीं थी, तो करोड़ों रुपये का भुगतान किस अधिकार से हुआ? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ, तो सीएजी को इतने व्यापक स्तर पर दस्तावेज क्यों मांगने पड़े? उत्तराखंड वन विकास निगम पहले भी विभिन्न विवादों में चर्चा में रहा है। ऐसे में यह मामला केवल वेतन निर्धारण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही का भी बन गया है। अब निगाहें सीएजी की जांच पर हैं। यदि आरोप सही सिद्ध होते हैं, तो यह उत्तराखंड के सार्वजनिक उपक्रमों में वित्तीय अनुशासन पर बड़ा प्रश्नचिह्न होगा। यदि आरोप निराधार साबित होते हैं, तो इससे संबंधित अधिकारियों को भी स्पष्ट रूप से राहत मिलेगी। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

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