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लॉगिंग में 32.98 लाख की पीडी के बाद अब कोसी खनन प्रकरण में 78.27 लाख रुपये की पीडी; विभागीय दस्तावेज़ों ने फिर खड़े किए जवाबदेही के सवाल

देहरादून/ रामनगर : सरकारी फाइलों की भी अपनी एक स्मृति होती है। वे भूलती नहीं हैं। वे बस कुछ समय के लिए अलमारी में रख दी जाती हैं। ऊपर धूल जम जाती है, नीचे नोटशीटें दब जाती हैं, लेकिन जैसे ही कोई नया दस्तावेज सामने आता है, पुरानी फाइल फिर सांस लेने लगती है। उत्तराखंड वन विकास निगम में शेर सिंह का मामला अब शायद ऐसी ही एक लंबी सरकारी कथा बन चुका है। करीब एक वर्ष पहले हमने विस्तार से बताया था कि कथित नियमविरुद्ध प्रोन्नतियों को लेकर शासन, कैबिनेट और राजभवन तक सवाल पहुंचे, लेकिन आदेशों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी रही। उसके बाद हाल ही में हमने सरकारी दस्तावेजों के आधार पर बताया कि पूर्वी रामनगर के लॉगिंग प्रभाग में लकड़ी चोरी, अवैध पातन, संयुक्त निरीक्षण और लगभग 32 लाख 98 हजार 330 रुपये की पीडी (क्षतिपूर्ति) के मामले में तत्कालीन प्रभागीय लॉगिंग प्रबंधक शेर सिंह से जवाब मांगा गया था। अब उसी नाम के साथ एक और सरकारी फाइल सामने आई है। इस बार जंगल की लकड़ी नहीं, बल्कि कोसी नदी का खनन है। और इस बार सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पीडी की राशि पहले से कहीं बड़ी है 78 लाख 27 हजार 680 रुपये। यानी सवाल भी बड़ा हो गया है।
गौरतलब है कि 14 जुलाई 2023 को क्षेत्रीय प्रबंधक (पश्चिमी क्षेत्र), रामनगर की ओर से तत्कालीन प्रभागीय प्रबंधक, खनन रामनगर रहे शेर सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता है। इस नोटिस में लिखा गया है कि खनन सत्र 2022-23 के दौरान कोसी नदी में अवैध खनन के कारण प्रभागीय वनाधिकारी, तराई पश्चिमी वन प्रभाग, रामनगर द्वारा दो अलग-अलग पीडी आरोपित की गईं। पहली 45,27,462 रुपये।दूसरी 33,00,218 रुपये। कुल मिलाकर 78,27,680 रुपये। सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि संयुक्त निरीक्षण के लिए पहले 18 मार्च 2023 की तिथि तय हुई। बाद में पत्राचार के बाद निरीक्षण 8 अप्रैल 2023 को निर्धारित हुआ। लेकिन नोटिस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। उसमें लिखा है कि दोनों ही तिथियों पर खनन प्रभाग, रामनगर का कोई अधिकारी अथवा कर्मचारी संयुक्त निरीक्षण में उपस्थित नहीं हुआ। और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि अनुपस्थिति का कारण भी विभाग को नहीं बताया गया। सरकारी भाषा में एक वाक्य दर्ज है यदि निरीक्षण में स्टाफ उपस्थित हो जाता, तो संभवतः पीडी जारी नहीं होती। यानी विभाग स्वयं यह मान रहा है कि यदि समय पर उपस्थिति होती, तो करोड़ों की सरकारी जवाबदेही शायद टल सकती थी। यह सवाल सरकारी उपस्थिति का हो जाता है। यह सवाल प्रशासनिक जिम्मेदारी का हो जाता है। यह सवाल उस व्यवस्था का हो जाता है जो कहती है कि निरीक्षण सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। लेकिन यदि निरीक्षण में ही विभाग मौजूद न हो तो फिर सरकारी रिकॉर्ड किसके भरोसे तैयार होंगे? कारण बताओ नोटिस केवल 2022-23 तक सीमित नहीं रहता। उसमें एक और पुरानी फाइल खोली जाती है। लिखा गया है कि खनन सत्र 2021-22 में भी कोसी नदी के मामले में 1 करोड़ 9 लाख 6 हजार 125 रुपये की पीडी जारी हुई थी। नोटिस कहता है कि एक वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते अपेक्षा थी कि इस पीडी को निरस्त या माफ कराने के लिए सकारात्मक प्रयास किए जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सरकारी भाषा में इसे शिथिलता एवं लापरवाही कहा गया है। कारण बताओ नोटिस का दायरा और बड़ा हो जाता है। इसमें वाहन परिवर्तन, स्वामित्व परिवर्तन, वारिसान नामांतरण और वाहन गेट परिवर्तन से जुड़ी समिति का उल्लेख भी है। रिकॉर्ड के अनुसार 9 मई 2023 को समिति की बैठक हुई। कार्यवृत्त समय पर जारी नहीं हुआ। लेकिन कार्यवाही पहले कर दी गई। नोटिस में इसे नियम विरुद्ध बताया गया है। यानी एक ही सरकारी दस्तावेज में खनन, पीडी, संयुक्त निरीक्षण, वाहन संबंधी प्रशासनिक निर्णय और विभागीय प्रक्रिया सभी एक साथ दर्ज हैं। इस नोटिस का सबसे दिलचस्प हिस्सा अंत में आता है। जहां लिखा गया है कि इनके द्वारा प्रभागीय प्रबंधक के दायित्वों का सही निर्वहन नहीं किया गया, जिसके कारण उत्तराखंड वन विकास निगम पर पीडी आरोपित हुई, अवैध खनन, लॉगिंग में चोरी, अवैध पातन जैसी घटनाएं सामने आती रहीं, और निगम की छवि धूमिल हुई।
यानी सरकारी दस्तावेज पहली बार खनन और लॉगिंग दोनों मामलों को एक साथ जोड़ते दिखाई देते हैं। अब दोनों फाइलों को जोड़ते हैं तो पहली फाइल में लॉगिंग, लकड़ी चोरी, 137 पेड़ों का अवैध पातन और लगभग 32.98 लाख रुपये की पीडी है। जबकि दूसरी फाइल में कोसी नदी, अवैध खनन की 78.27 लाख रुपये की पीडी दर्ज है।

दोनों मामलों में कारण बताओ नोटिस और दोनों में प्रशासनिक लापरवाही के आरोप लगाए गए हैं। दोनों में एक ही अधिकारी का नाम है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है सरकारी नोटिस आरोप लगाता है। सरकारी फाइल जवाब मांगती है। लेकिन उसके बाद क्या हुआ? क्या शेर सिंह ने अपना स्पष्टीकरण दिया? क्या विभागीय जांच पूरी हुई? क्या आरोप सिद्ध हुए? यदि नहीं हुए तो मामला तीन साल बाद भी लंबित क्यों है?
यदि सिद्ध हुए तो अंतिम कार्रवाई क्या हुई? क्या पीडी की जिम्मेदारी तय हुई? क्या किसी अधिकारी से वसूली हुई? या फिर यह फाइल भी उन सैकड़ों सरकारी फाइलों में शामिल हो गई जिनका अंतिम पन्ना हमेशा यही कहता है प्रकरण विचाराधीन है। कुल मिलाकर यह रिपोर्ट किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने के लिए नहीं है। प्रस्तुत तथ्यों का आधार विभागीय कारण बताओ नोटिस एवं उपलब्ध सरकारी अभिलेख हैं। कारण बताओ नोटिस आरोपों का प्रारंभिक दस्तावेज होता है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। संबंधित अधिकारी का पक्ष, स्पष्टीकरण तथा विभागीय जांच का अंतिम परिणाम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लेकिन लोकतंत्र में एक सवाल पूछना जरूरी है यदि एक ही अधिकारी के कार्यकाल से जुड़ी फाइलों में बार-बार पीडी, लापरवाही, अवैध खनन, अवैध पातन, चोरी और कारण बताओ नोटिस दर्ज होते रहें, तो जवाबदेही आखिर तय कब होगी? क्योंकि जंगल केवल पेड़ों से नहीं बनता। नदी केवल रेत से नहीं बनती। सरकारी व्यवस्था केवल फाइलों से नहीं चलती।
उसे जवाबों की भी जरूरत होती है और फिलहाल, इन फाइलों में सवाल कहीं ज्यादा हैं, जवाब कहीं कम।
इस पूरे मामलें में जब हमनें शेर सिंह से उनका पक्ष जानने के लिए उनके मोबाईल फोन पर सम्पर्क किया तो उन्होंने अपना फोन रिसीव नहीं किया l

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