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नैनीताल/देहरादून। कल्पना कीजिए कि एक सुबह आपके दरवाज़े पर एक नोटिस पहुंचे और उसमें लिखा हो 24 घंटे के भीतर यह राज्य छोड़ दीजिए। सिर्फ एक दिन। न कोई तैयारी, न बच्चों की पढ़ाई की चिंता, न वर्षों से बसे जीवन का हिसाब। देहरादून के वसंत विहार में रह रहे पाकिस्तानी मूल के सिख नागरिक सरदार मनजीत सिंह और उनके परिवार के सामने कुछ ऐसा ही संकट खड़ा हुआ। लेकिन इस कहानी में अभी पूर्ण विराम नहीं लगा है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फिलहाल इस परिवार को राहत देते हुए राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है और अगली सुनवाई तक परिवार के खिलाफ जारी आदेश पर रोक बरकरार रखी है। यह सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं है। यह एक ऐसे परिवार की कहानी है, जिसकी जड़ें पाकिस्तान में थीं लेकिन जिसकी शाखाएं अब भारत की मिट्टी में फैल चुकी हैं। मनजीत सिंह पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के रहने वाले हैं। वर्ष 2019 में वे अपने परिवार के साथ लॉन्ग टर्म वीजा (एलटीवी) पर भारत आए थे। उनके अनुसार उनका वीजा अभी भी वैध है और समय-समय पर उसका नवीनीकरण भी किया गया है।
इन पांच वर्षों में उनके परिवार का जीवन भारत में बस चुका है। बड़ी बेटी इंजीनियर बनने का सपना लेकर बीटेक की पढ़ाई कर रही है। दूसरी बेटी बीडीएस की छात्रा है और डॉक्टर बनने की तैयारी में जुटी है। परिवार का छोटा बेटा अभी स्कूल में पढ़ता है। घर, स्कूल, कॉलेज, दोस्त, पड़ोस, भविष्य सब कुछ अब भारत से जुड़ चुका है। ऐसे में अचानक मिला नोटिस केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि पूरे परिवार के जीवन पर मंडराता एक अनिश्चित प्रश्न बन गया। मामले के अनुसार राज्य सरकार ने 31 मई को मनजीत सिंह को नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर राज्य छोड़ने को कहा था। यह नोटिस उन्हें 2 जून को प्राप्त हुआ। एक परिवार, जो वर्षों से यहां रह रहा है, जिसके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, उसे एक दिन में सब कुछ समेटकर जाने के लिए कह दिया गया। मनजीत सिंह ने इस आदेश को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी। मंगलवार को हुई सुनवाई में राज्य सरकार ने अदालत से कहा कि मामले की विस्तृत जांच आवश्यक है और इसके लिए अतिरिक्त समय चाहिए। सरकार ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला दिया। वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने सरकार को चार सप्ताह का समय देते हुए अगली सुनवाई 11 अगस्त को निर्धारित कर दी। तब तक परिवार को राहत मिली हुई है।
सरकार का कहना है कि जिस क्षेत्र में मनजीत सिंह का परिवार रह रहा है, वहां भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) का मुख्यालय स्थित है। इसलिए सुरक्षा के दृष्टिकोण से मामले की जांच जरूरी है। सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की प्राथमिक आवश्यकता है। इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता। लेकिन दूसरी ओर एक परिवार भी है, जो कह रहा है कि उसका वर्तमान और भविष्य भारत से जुड़ चुका है। यहीं से यह मामला केवल कानून की किताबों का विषय नहीं रह जाता। यह उस संतुलन का प्रश्न बन जाता है जहां एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा है और दूसरी तरफ मानवीय संवेदनाएं। कानूनी दस्तावेजों में नाम, वीजा नंबर और फाइलें दिखाई देती हैं, लेकिन उन फाइलों के पीछे कुछ चेहरे भी होते हैं।
एक बेटी जो इंजीनियर बनना चाहती है। दूसरी बेटी जो दंत चिकित्सक बनने का सपना देख रही है। एक छोटा बच्चा जो शायद अभी यह भी नहीं समझता कि अदालत क्या होती है और वीजा क्या होता है। उनके लिए भारत सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि उनका वर्तमान जीवन है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि यदि किसी परिवार ने वर्षों तक यहां रहकर अपनी सामाजिक और शैक्षणिक पहचान बना ली हो, तो उसके भविष्य का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाना चाहिए? देश में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) लागू होने के बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदाय के लोगों के लिए भारतीय नागरिकता का रास्ता खुला।उत्तराखंड में अब तक पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए 153 हिंदू और सिख शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता मिल चुकी है। कई अन्य आवेदन अभी भी जांच प्रक्रिया में हैं। ऐसे माहौल में मनजीत सिंह जैसे परिवारों की उम्मीदें भी इसी व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं। मनजीत सिंह जिस खैबर पख्तूनख्वा प्रांत से आते हैं, वहां हिंदू और सिख समुदाय की आबादी बहुत कम है। पाकिस्तान की जनगणना के अनुसार करोड़ों की आबादी वाले इस प्रांत में हिंदुओं की संख्या लगभग 50 हजार और सिखों की संख्या करीब 10 हजार बताई जाती है। यह वही इलाका है जो अपनी सामरिक स्थिति, ऐतिहासिक महत्व और सीमावर्ती चुनौतियों के कारण अक्सर चर्चा में रहता है। लेकिन इस समय चर्चा किसी सीमा की नहीं, बल्कि एक परिवार की है।
11 अगस्त को जब यह मामला फिर अदालत के सामने आएगा तो वहां केवल एक प्रशासनिक आदेश की वैधता पर बहस नहीं होगी। बहस इस बात पर भी होगी कि सुरक्षा और संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। बहस इस बात पर भी होगी कि वर्षों से भारत में रह रहे एक परिवार के भविष्य का निर्धारण किन मानकों पर किया जाए। और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि क्या किसी बच्चे का सपना भी किसी कानूनी बहस का हिस्सा बन सकता है? फिलहाल मनजीत सिंह और उनका परिवार राहत की सांस ले रहा है। लेकिन उनके घर में अब भी एक तारीख लिखी हुई है 11 अगस्त। क्योंकि कभी-कभी अदालतों में सिर्फ मुकदमे नहीं चलते, बल्कि पूरे परिवारों का भविष्य इंतजार करता है।

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