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हरिद्वार से कर्णप्रयाग तक फैला तनाव, पंजाब से सांसद-विधायक पहुंचे उत्तराखंड

देहरादून: उत्तराखंड के चमोली जिले के कर्णप्रयाग में पार्किंग को लेकर शुरू हुआ एक विवाद अब केवल एक स्थानीय कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। यह मामला अब धार्मिक पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और न्यायिक निष्पक्षता के सवालों के साथ राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनता दिखाई दे रहा है।
आज पंजाब से सांसदों, विधायकों और सिख संगठनों के प्रतिनिधियों का एक बड़ा दल हरिद्वार पहुंचा। उनका कहना है कि कर्णप्रयाग में हुई हिंसक घटना में दोनों पक्ष शामिल थे, लेकिन पुलिस कार्रवाई केवल निहंग सिखों के खिलाफ हुई। प्रतिनिधिमंडल ने गिरफ्तार युवकों के साथ कथित दुर्व्यवहार और अदालत में पेशी के दौरान बेअदबी का आरोप भी लगाया है।

सवाल यह है कि क्या यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला है, या फिर अब यह पहचान और सम्मान की राजनीति का हिस्सा बन चुका है? पंजाब से लोकसभा सांसद सरबजीत सिंह खालसा ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक दीपम सेठ से मुलाकात कर पूरे मामले को उनके सामने रखेगा।
उनका कहना है कि गिरफ्तार किए गए युवकों ने हमला नहीं किया बल्कि आत्मरक्षा में कार्रवाई की थी। यदि उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया होता तो उनके साथ और गंभीर घटना हो सकती थी।
खालसा का कहना है कि निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आखिर चोटें किन परिस्थितियों में लगीं और वास्तविक दोषी कौन हैं।

यह बयान उस समय आया है जब पुलिस पहले ही चार निहंग सिखों को गिरफ्तार कर चुकी है और तीन आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है।
शिरोमणि अकाली दल के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार का प्रदर्शन करना नहीं बल्कि पीड़ित युवकों को न्याय दिलाना है।
उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर पहले भी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से बातचीत हुई है और आगे भी संवाद जारी रहेगा।
लेकिन सवाल यह भी है कि यदि उद्देश्य केवल संवाद है, तो फिर पंजाब से इतने बड़े राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल के आने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह घटना स्थानीय सीमाओं को पार कर चुकी है?

16 जून को कर्णप्रयाग में निहंग सिख श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के बीच पार्किंग को लेकर विवाद हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कहासुनी कुछ ही मिनटों में हिंसक झड़प में बदल गई।
घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए, जिनमें कुछ लोगों के हाथों में तलवारें दिखाई दे रही थीं। आरोप लगे कि निहंगों ने तलवारें लहराईं और स्थानीय लोगों के साथ मारपीट की।
दूसरी ओर सिख संगठनों का कहना है कि उनके लोगों पर पहले हमला किया गया था और उन्होंने केवल आत्मरक्षा की। यानी एक ही घटना के दो अलग-अलग संस्करण सामने हैं। घटना के बाद स्थानीय व्यापारियों और नागरिकों ने बदरीनाथ हाईवे जाम कर दिया। विरोध बढ़ने पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए चार निहंगों को गिरफ्तार कर लिया।
सिख संगठनों का आरोप है कि पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की। उनका कहना है कि स्थानीय पक्ष की भूमिका की अनदेखी की गई और पूरे मामले को एक समुदाय
विशेष के खिलाफ मोड़ दिया गया।

यह आरोप केवल पुलिस कार्रवाई पर नहीं बल्कि राज्य की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि गिरफ्तार युवकों को अपमानजनक परिस्थितियों में अदालत में पेश किया गया, जिससे सिख समाज की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।
यहां मामला केवल चोट और एफआईआर का नहीं रह जाता। अब इसमें सम्मान, पहचान और धार्मिक अस्मिता जैसे शब्द शामिल हो चुके हैं। जब किसी समुदाय को लगता है कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ, तब अदालत से पहले भावनाएं अदालत बन जाती हैं। यही वजह है कि पंजाब ही नहीं बल्कि विदेशों में बैठी सिख संगत भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दे रही है।
21 जून को सिख संगठनों द्वारा प्रस्तावित कर्णप्रयाग कूच से पहले ही प्रशासन ने कर्णप्रयाग क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 161 लागू कर दी है।
संवेदनशील क्षेत्रों में भारी पुलिस बल और अर्द्धसैनिक बल तैनात किए गए हैं। रुद्रप्रयाग के नगरासू क्षेत्र स्थित एक गुरुद्वारे में कुछ निहंगों के एकत्र होने की सूचना के बाद भी प्रशासन सतर्क है। सरकार का प्रयास है कि स्थिति नियंत्रण में रहे और किसी प्रकार का साम्प्रदायिक या सामाजिक तनाव न बढ़े। हरिद्वार के एसएसपी नवनीत सिंह भुल्लर ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल की वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की व्यवस्था कर दी गई है।
प्रशासन का कहना है कि सभी कार्यक्रम पूर्व निर्धारित हैं और कानून-व्यवस्था को प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ सवाल लगातार बने हुए हैं क्या जांच वास्तव में निष्पक्ष होगी? क्या दोनों पक्षों की भूमिका समान रूप से जांची जाएगी? क्या राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों के दबाव से जांच की दिशा प्रभावित होगी?
और सबसे बड़ा सवाल क्या सड़क पर शुरू हुआ यह विवाद अब समुदायों के बीच अविश्वास की नई रेखा खींच रहा है?
कुल मिलाकर कर्णप्रयाग की घटना केवल एक मारपीट की घटना नहीं रह गई है। यह अब न्याय, पहचान, राजनीतिक हस्तक्षेप और सामाजिक विश्वास की परीक्षा बन गई है। एक तरफ स्थानीय लोग हैं जो सुरक्षा और कानून की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ सिख संगठन हैं जो सम्मान और निष्पक्षता की मांग उठा रहे हैं। सच्चाई क्या है, इसका फैसला जांच और अदालत करेगी। लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि उत्तराखंड की पहाड़ियों में शुरू हुआ यह
विवाद अब पंजाब की राजनीति और देशभर की सिख संगत की भावनाओं से जुड़ चुका है। अब निगाहें डीजीपी से होने वाली बैठक और आगे की प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं। क्योंकि कभी-कभी एक सड़क का झगड़ा केवल सड़क का झगड़ा नहीं रहता, वह समाज के भीतर छिपे अविश्वास को भी सामने ले आता है।

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