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संयुक्त जांच में अवैध कटान की पुष्टि का दावा, 18 कर्मचारियों पर पूरक आरोपपत्र का प्रस्ताव; आरोपित अनुभाग अधिकारी की पदोन्नति से डीपीसी की भूमिका पर उठे सवाल

देहरादून। उत्तराखंड वन विकास निगम के टोंस, पुरोला लॉगिंग प्रभाग में कथित अवैध कटान का मामला अब विभागीय कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार आन्द्री गाड़ी बीट के लॉट संख्या 69, 72, 73, 74 और 75/21-22 में अवैध कटान की शिकायत के बाद संयुक्त निरीक्षण कराया गया था। निरीक्षण में वन निगम और वन विभाग के छह कर्मचारियों ने हस्ताक्षर किए और कथित अवैध कटान की पुष्टि की गई।
मामले में 15 नवंबर 2025 को प्रभागीय लॉगिंग प्रबंधक, टोंस, पुरोला की ओर से क्षेत्रीय प्रबंधक, टिहरी क्षेत्र को भेजे पत्र में तत्कालीन एवं कार्यरत तीन प्रभागीय लॉगिंग प्रबंधकों समेत 18 कर्मचारियों के खिलाफ पूरक आरोपपत्र जारी करने के लिए आलेख प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आती है। कथित आरोपित धनराशि 8,10,04,518 रुपए बताई गई है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 18 कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव आखिर एक अधिकारी तक कैसे सिमट गया?
बता दें कि टोंस वन प्रभाग, पुरोला के उपवन संरक्षक ने 23 दिसंबर 2022 को वन निगम को कथित अवैध कटान की सूचना दी थी। इसके बाद 28 दिसंबर 2022 को संयुक्त निरीक्षण टीम गठित हुई।
टीम में वन निगम के अनुभाग अधिकारी पदमदास सहित दो कर्मचारी और वन विभाग के तीन कर्मचारी शामिल बताए गए हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार छहों ने निरीक्षण दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। यानी मामला केवल शिकायत तक सीमित नहीं रहा। सरकारी कर्मचारियों की संयुक्त टीम ने मौके पर निरीक्षण किया और कथित अनियमितता दर्ज की। अब सवाल है कि जिम्मेदारी तय करते समय इन सभी संबंधित कर्मचारियों की भूमिका किस तरह जांची गई?
आरोप है कि कथित अवैध कटान की अवधि में तीन प्रभागीय लॉगिंग प्रबंधक तैनात थे, लेकिन पूरक आरोपपत्र केवल राम कुमार के खिलाफ जारी कराया गया। यदि तीन अधिकारी संबंधित अवधि में जिम्मेदारी के पद पर थे तो उनकी भूमिका अलग-अलग किस आधार पर तय हुई? क्या उनके कार्यकाल, आदेशों, निरीक्षण और निगरानी संबंधी रिकॉर्ड की जांच हुई? यदि बाकी अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं बनी तो उसका आधार क्या था?
18 नामों से एक नाम तक पहुंची कार्रवाई का जवाब अब विभागीय रिकॉर्ड से मांगा जा रहा है।
1.74 करोड़ की कथित जिम्मेदारी और फिर पदोन्नति
मामले का दूसरा गंभीर पहलू अनुभाग अधिकारी पदमदास से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार वे संयुक्त निरीक्षण दल में शामिल थे। उन पर 1,74,87,352 रुपए की कथित वित्तीय जिम्मेदारी का आरोप लगाए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद उनके एक पद ऊपर पदोन्नत किए जाने का दावा किया जा रहा है।
यहां सवाल सीधे डीपीसी पर पहुंचता है, क्या पदोन्नति से पहले डीपीसी को विभागीय कार्रवाई की स्थिति की जानकारी दी गई थी? यदि जानकारी थी तो पदोन्नति किस नियम के तहत हुई? यदि जानकारी नहीं थी तो डीपीसी को जानकारी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी थी? यह स्पष्ट रहना चाहिए कि आरोप लगना दोष सिद्ध होना नहीं है। लेकिन लंबित विभागीय कार्रवाई और पदोन्नति के बीच नियमों का पालन हुआ या नहीं, यह रिकॉर्ड से स्पष्ट होना चाहिए।
आरोप लगाने वालों ने नरेंद्र सिंह रावत की पदोन्नति को लेकर भी सवाल उठाए हैं। दावा है कि पदोन्नति सूची में पदमदास और नरेंद्र सिंह रावत क्रमशः छठे और दसवें स्थान पर थे। मुख्यालय में तैनात एक कर्मचारी के साथ कथित विशेष निकटता के आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए निगम के लिए सबसे बेहतर जवाब यही होगा कि वह वरिष्ठता, पात्रता और डीपीसी की संस्तुति के आधार पर स्थिति स्पष्ट करे।
वन निगम मुख्यालय में तैनात श्याम सिंह रावत को महाप्रबंधक उत्पादन के कार्यालय में स्थानांतरित किए जाने का दावा भी सामने आया है। सवाल यह है कि यदि महाप्रबंधक उत्पादन का पद लंबे समय से रिक्त है और वहां नियमित कार्यालयी व्यवस्था नहीं है तो संबंधित कर्मचारी वहां किस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं? यह आरोप भी लगाया गया है कि प्रबंध निदेशक कार्यालय से जारी कुछ पत्रों में संबंधित कर्मचारी के आद्याक्षर दिखाई देते हैं। इसकी पुष्टि कार्यालयी रिकॉर्ड से की जानी चाहिए।
मामले में सबसे बड़ा सवाल अवैध कटान से आगे बढ़कर जिम्मेदारी तय करने के तरीके का बन गया है। यदि 18 कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव था तो अंतिम कार्रवाई एक अधिकारी पर क्यों सिमटी? यदि तीन प्रभागीय लॉगिंग प्रबंधक जिम्मेदारी की अवधि में तैनात थे तो केवल एक के खिलाफ कार्रवाई क्यों? यदि अनुभाग अधिकारी के खिलाफ करोड़ों की कथित वित्तीय जिम्मेदारी थी तो पदोन्नति के समय डीपीसी के सामने क्या तथ्य रखे गए?
इन सवालों के जवाब बयान से नहीं, जांच फाइल, आरोपपत्र और डीपीसी रिकॉर्ड से मिलेंगे।
वन निगम यदि आरोपों को निराधार मानता है तो उसे दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। और यदि रिकॉर्ड में अनियमितता है तो कार्रवाई का पैमाना व्यक्ति देखकर नहीं, जिम्मेदारी देखकर तय होना चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ कटे पेड़ों का नहीं है सवाल यह भी है कि करोड़ों की कथित जिम्मेदारी वाली फाइल में 18 नाम आखिर एक नाम तक कैसे पहुंच गए।

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