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मतपत्र से फैसला होना था, हाथों ने लिख दी सियासत की नई इबारत एक थप्पड़ ने 15 साल पुरानी अदावत को फिर जगा दिया

किच्छा। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव होते हैं। यहां हथियार होना चाहिए मतपत्र, ताकत होनी चाहिए तर्क और फैसला होना चाहिए जनता का। लेकिन किच्छा में मंगलवार को जो हुआ, उसने इस बुनियादी लोकतांत्रिक तस्वीर पर सवाल खड़ा कर दिया। निकाय चुनाव के मतदान के बीच विधायक तिलकराज बेहड़ को थप्पड़ मारे जाने की घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हम स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ रहे हैं या छात्रसंघ चुनाव की उस शैली को दोहरा रहे हैं, जिसमें नारे पहले और नतीजे बाद में आते हैं?
यह सवाल इसलिए और चुभता है क्योंकि छात्रसंघ चुनावों में कभी-कभी दिखाई देने वाली नारेबाजी, शक्ति प्रदर्शन और व्यक्तिगत टकराव की संस्कृति अब अगर नगर निकाय चुनावों तक पहुंचने लगे तो शहर का भविष्य किसके हाथ में रहेगा मतदाता के या समर्थकों की भीड़ के? मंगलवार को किच्छा और सिरौलीकलां में मतदान था। दिनभर सब कुछ चुनावी प्रक्रिया के मुताबिक चलता रहा। लेकिन शाम होते-होते राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया। आरोप है कि पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के एक समर्थक ने भीड़ के बीच विधायक तिलकराज बेहड़ के साथ हाथापाई की और उन्हें थप्पड़ मार दिया। मौके पर पुलिस मौजूद थी, लोग मौजूद थे और मोबाइल कैमरे भी मौजूद थे। देखते ही देखते घटना कैमरों से निकलकर इंटरनेट मीडिया पर पहुंच गई। मतपेटी सामने थी, लेकिन बहस हाथ तक पहुंच गई।
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा व्यंग्य है। जनता अपने प्रतिनिधि चुनने मतदान केंद्र तक पहुंची थी। नेताओं और समर्थकों से अपेक्षा थी कि वे मतदाताओं के बीच अपने मुद्दे रखें, लेकिन यहां मुद्दों की जगह हाथ ने अपनी दलील रख दी। लोकतंत्र में शायद इससे ज्यादा विडंबनापूर्ण तस्वीर दूसरी नहीं हो सकती कि जिस दिन जनता को अपने मत की ताकत दिखानी थी, उसी दिन किसी जनप्रतिनिधि पर हाथ उठने की खबर सुर्खियां बन जाए। और यह कहानी केवल मंगलवार की नहीं है।
किच्छा की राजनीति में विधायक तिलकराज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला लंबे समय से एक-दूसरे के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद कई बार सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे हैं। मंगलवार की घटना ने इस पुराने राजनीतिक तनाव को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया।
सियासी गलियारों में मंगलवार के घटनाक्रम की चर्चा वर्ष 2011 तक पहुंच गई है। उस समय रुद्रपुर के भदईपुरा रामलीला मैदान से जुड़े विवाद के दौरान बेहड़ और शुक्ला के आमने-सामने आने की चर्चा रही थी। राजनीतिक हलकों में यह आरोप भी सामने आया था कि तब तिलकराज बेहड़ ने राजेश शुक्ला को थप्पड़ मारा था।
करीब 15 वर्ष बाद तस्वीर बदल गई। इस बार आरोप बेहड़ के साथ थप्पड़ मारने का है और आरोप शुक्ला के समर्थक पर है। यानी किरदारों के आसपास की भूमिका बदली, लेकिन राजनीतिक पटकथा फिर वही पुरानी लगने लगी। सवाल यही है क्या राजनीति भी पुराने हिसाब की कॉपी लेकर चलती है?
अगर ऐसा है तो फिर चुनाव घोषणापत्रों की जरूरत ही क्या है? हर पांच साल बाद पुराने हिसाब की नई किश्त जारी हो और समर्थक उसे सड़क पर वसूलने निकल पड़ें तो जनता आखिर किससे विकास का हिसाब मांगे?
स्थानीय निकाय चुनाव का सीधा संबंध शहर के रोजमर्रा के जीवन से है। सड़क कैसी होगी, नाली साफ होगी या नहीं, कूड़ा कहां जाएगा, पानी की व्यवस्था कैसी होगी, बाजार की समस्याएं कौन सुनेगा ये वे सवाल हैं जिन पर नगर निकाय की राजनीति होनी चाहिए। लेकिन यदि चुनाव की पहचान प्रत्याशियों के मुद्दों से ज्यादा समर्थकों के टकराव, नारेबाजी, शक्ति प्रदर्शन और मारपीट से होने लगे तो यह केवल राजनीतिक दलों की समस्या नहीं है। यह उस शहर की राजनीतिक संस्कृति का सवाल है।
छात्रसंघ चुनावों में युवाओं का जोश समझ में आता है, लेकिन नगर निकाय चुनाव में वही तेवर लोकतांत्रिक मर्यादा के लिए खतरे की घंटी बन सकते हैं। नगर पालिका कोई छात्रसंघ नहीं है और मतदाता किसी संगठन का पदाधिकारी नहीं। यहां हर वोटर अपने शहर का भविष्य चुनने आता है। मंगलवार की घटना में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि राजनीतिक विरोध का अगला पड़ाव हाथापाई है, तो उसके बाद क्या होगा? आज थप्पड़ है, कल धक्का-मुक्की होगी और परसों समर्थकों की भीड़ आमने-सामने होगी क्या राजनीति को इसी दिशा में जाना है? राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता लोकतंत्र की खूबसूरती है। राजनीतिक दुश्मनी उसका विकृत रूप। मतभेद लोकतंत्र को मजबूत करते हैं, लेकिन मनभेद जब हिंसा में बदल जाएं तो लोकतंत्र कमजोर होता है। किच्छा में मंगलवार को जो हुआ, उसे किसी भी पक्ष के समर्थक के लिए बहादुरी का तमगा नहीं बनाया जाना चाहिए। राजनीतिक समर्थन का अर्थ यह नहीं कि नेता के विरोधी पर हाथ उठा दिया जाए। और नेता की लोकप्रियता का अर्थ यह भी नहीं कि समर्थकों को कानून अपने हाथ में लेने की छूट मिल जाए।
इस घटना की निष्पक्ष जांच और दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति पर कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी है। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि राजनीतिक दल अपने समर्थकों को साफ संदेश दें कि चुनावी मुकाबला दुश्मनी का लाइसेंस नहीं है। किच्छा के मतदाताओं ने मतदान किया है। अब उनकी उम्मीद यही होगी कि उनके शहर की राजनीति भी उसी परिपक्वता का परिचय दे।
क्योंकि चुनाव में असली ताकत भीड़ की नहीं, एक वोट की होती है। थप्पड़ से कोई राजनीतिक जीत नहीं होती। विरोधी को चुप कराया जा सकता है, लोकतंत्र को नहीं। और अगर निकाय चुनाव सचमुच छात्रसंघ चुनाव की तर्ज पर लड़े जाने लगे, तो फिर सवाल केवल आज की घटना का नहीं रहेगा कल की राजनीति किस तरह की होगी, यह भी इसी पीढ़ी को तय करना है। किच्छा की इस घटना से सबक यही होना चाहिए कि अगली बार हाथ नहीं उठना चाहिए, हाथ सिर्फ मतपत्र पर उठना चाहिए।

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