
विधायक की लोकप्रियता से ज्यादा अब देखी जाएगी सीट जिताने की क्षमता, 47 सीटें बचाने की चुनौती, 23 पर सेंध की तैयारी
राजेश सरकार
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तारीख भले अभी घोषित न हुई हो, लेकिन सियासी घड़ी तेजी से चुनाव की तरफ बढ़ रही है। विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मार्च 2027 में पूरा होना है और इससे पहले भाजपा ने अपनी सबसे अहम कवायद शुरू कर दी है कौन फिर मैदान में उतरेगा और किसे इस बार संगठन बाहर का रास्ता दिखाएगा?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व को लेकर पार्टी की स्थिति स्पष्ट होने के बाद अब भाजपा के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा टिकट को लेकर है। सवाल सिर्फ 47 मौजूदा भाजपा विधायकों का नहीं है। पार्टी उन 23 सीटों पर भी नजर रख रही है, जहां 2022 में उसे हार मिली थी। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर में अंतिम सर्वे कराने की तैयारी है और इसमें छह प्रमुख बिंदुओं को आधार बनाया जाएगा।
यानी 2027 का चुनाव भाजपा के लिए सिर्फ सरकार के काम का इम्तिहान नहीं होगा। विधायक भी अपनी-अपनी सीट पर परीक्षा देंगे।
पांच साल पहले जनता ने जिसे विधायक बनाया, क्या आज भी वही चेहरा उतना ही मजबूत है? भाजपा के टिकट चयन में यही सबसे बड़ा सवाल बनता दिखाई दे रहा है।
पार्टी के स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक विधायक की लोकप्रियता, जनता के बीच मौजूदगी, कार्यकर्ताओं की नाराजगी, संगठन के साथ तालमेल और स्थानीय परिस्थितियों को परखा जा रहा है। मंडल अध्यक्षों और जिलाध्यक्षों से फीडबैक लेने की बात भी सामने आई है।
मतलब साफ है कि सिर्फ विधायक होना टिकट की गारंटी नहीं। विधायक की पांच साल की सक्रियता देखी जाएगी। क्षेत्र में कितना समय दिया? जनता की शिकायतों पर कितनी तेजी से काम किया? सरकार की योजनाएं जमीन तक पहुंचीं या नहीं? संगठन के कार्यक्रमों में भागीदारी कैसी रही? कार्यकर्ता उसके साथ हैं या उससे दूरी बना रहे हैं? और फिर आएगा सबसे कठिन सवाल अगर आज चुनाव हो जाए तो क्या यह विधायक अपनी सीट जीत सकता है?
यही सवाल कई विधायकों की राजनीतिक किस्मत तय कर सकता है।
चुनाव में मुकाबला सिर्फ अपने उम्मीदवार से नहीं होता। भाजपा इस बार यह भी देख रही है कि सामने वाला कितना भारी है।
2022 में इस सीट पर जीत का अंतर कितना था? मुकाबला कांग्रेस से सीधा था या किसी तीसरे उम्मीदवार ने वोट काटे? पिछली बार जो प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहा, उसकी आज क्या स्थिति है? क्या वह फिर मैदान में है? क्या विपक्ष ने कोई नया मजबूत चेहरा तैयार किया है?
भाजपा के लिए यही गणित बेहद महत्वपूर्ण होगा। किसी विधायक ने पिछली बार बड़ी जीत हासिल की हो, लेकिन पांच साल बाद विपक्ष का नया उम्मीदवार सामाजिक और राजनीतिक रूप से मजबूत हो गया हो तो समीकरण बदल सकता है।
दूसरी तरफ, कम अंतर से जीती सीट पर भी यदि मौजूदा विधायक की व्यक्तिगत पकड़ मजबूत बनी हुई है तो पार्टी उसे फिर मौका दे सकती है। यानी इस बार टिकट का फॉर्मूला केवल हमारा विधायक कैसा है? नहीं होगा। उसके साथ यह भी पूछा जाएगा कि उसके सामने कौन है?
भाजपा की हालिया संगठनात्मक कवायद में 2022 में हारी सीटों पर भी जमीन की स्थिति जानने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी सिर्फ मौजूदा विधायकों का मूल्यांकन नहीं कर रही, बल्कि विपक्षी कब्जे वाली सीटों पर संभावित चेहरों की तलाश भी कर रही है।
उत्तराखंड को सिर्फ पहाड़ और मैदान में बांटकर चुनावी गणित समझना संभव नहीं है। हर विधानसभा का अपना सामाजिक समीकरण है।
पर्वतीय सीटों पर ठाकुर, ब्राह्मण और अनुसूचित जाति-जनजाति के सामाजिक समीकरण अलग भूमिका निभाते हैं। मैदान में जातीय और सामुदायिक संरचना का गणित कई सीटों पर अलग दिखाई देता है। इसलिए सर्वे में सवाल सिर्फ लोकप्रियता का नहीं होगा। कौन उम्मीदवार किस सामाजिक समूह में स्वीकार्य है?
किस चेहरे से किस वर्ग का समर्थन बढ़ सकता है? कहां पुराने समीकरण टूट रहे हैं और कहां नए समीकरण बन रहे हैं?
यही वह जगह है जहां कोई नया चेहरा अचानक पुराने विधायक के सामने मजबूत दावेदार बन सकता है।
भाजपा के भीतर उम्र को लेकर चर्चा कोई नई बात नहीं है। लेकिन किसी विधायक का केवल उम्र के कारण टिकट कटना तय है ऐसा निष्कर्ष अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से नहीं निकाला जा सकता। असल कसौटी शायद उम्र से ज्यादा सक्रियता और चुनावी उपयोगिता होगी।
70 साल की उम्र पार कर चुका नेता अगर क्षेत्र में मजबूत है तो उसकी स्थिति अलग हो सकती है और अपेक्षाकृत कम उम्र का विधायक अगर जनता तथा संगठन से लगातार दूर है तो उसकी स्थिति भी अलग हो सकती है। इसलिए असली सवाल उम्र नहीं, रिपोर्ट कार्ड है।
वहीँ पार्टी के स्तर पर विधायक निधि के उपयोग को भी प्रदर्शन के संकेतकों में शामिल किए जाने की चर्चा है। हालिया रिपोर्टों में विधायकों के कामकाज, क्षेत्रीय सक्रियता और निधि उपयोग को टिकट मूल्यांकन से जोड़े जाने का उल्लेख है।
भाजपा में टिकट की अंतिम सूची तक पहुंचने का रास्ता लंबा है। मंडल और जिलास्तर के फीडबैक के बाद सांसदों की राय, संगठन की रिपोर्ट और सर्वे एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी भी महत्वपूर्ण हो सकती है। संगठन के भीतर होने वाली समन्वय बैठकों और संघ से मिलने वाले फीडबैक की चर्चा भी राजनीतिक हलकों में है। हालांकि ऐसी आंतरिक बैठकों की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं होती, इसलिए किसी विशेष नाम को अभी से तय उम्मीदवार बताना जल्दबाजी होगी। लेकिन एक बात साफ है टिकट अब सिर्फ मांगने से नहीं मिलेगा, उसके लिए अपना चुनावी उपयोग साबित करना होगा।
बता दें कि 2022 में भाजपा ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 47 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के खाते में 20 सीटें गई थीं।
2027 में भाजपा के सामने दोहरी चुनौती है। जो जीता है, उसे बचाना। जो हारा है, उसे जीतना। इसीलिए हर सीट का अलग हिसाब बनेगा। कहीं मौजूदा विधायक पर भरोसा दोहराया जाएगा, कहीं नया चेहरा एंटी-इन्कम्बेंसी से निपटने का विकल्प हो सकता है और कहीं विपक्षी खेमे के मजबूत उम्मीदवार को देखते हुए रणनीति बदली जा सकती है। यानी भाजपा की टिकट सूची आने से पहले ही असली चुनाव शुरू हो चुका है।
कुल मिलाकर अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि विधायक ने 2022 में जीत हासिल की थी। सवाल यह है कि 2027 में पार्टी को उससे कितनी उम्मीद है।
सर्वे की रिपोर्ट, संगठन की राय, सांसदों का फीडबैक, जातीय समीकरण, विधायक का कामकाज और सामने खड़े विपक्षी उम्मीदवार का वजन इन सबका जोड़ बताएगा कि कमल के निशान पर पुराना चेहरा होगा या कोई नया नाम। टिकट की लड़ाई अभी पर्दे के पीछे है। लेकिन कई विधायकों के लिए यह लड़ाई शायद चुनाव से भी बड़ी है क्योंकि पहले उन्हें जनता के सामने नहीं, अपनी ही पार्टी की परीक्षा में पास होना है।
