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राजधानी में 14 दिन, 4 हत्याएं और पुलिस के दावों पर सवाल

राजेश सरकार
देहरादून:
देहरादून सिर्फ उत्तराखंड की राजधानी नहीं है, यह पहाड़ की उम्मीदों का शहर भी है। लेकिन इन दिनों इस शहर की सुबहें अखबार की सुर्खियों से नहीं, सायरन की आवाज़ से खुल रही हैं। 14 दिनों के भीतर 4 हत्याएं। दिनदहाड़े। भीड़भाड़ वाले बाजारों में। और सबसे चिंताजनक बात दोनों ताजा मामलों में मृतकों ने पहले ही पुलिस को अपनी जान का खतरा बताया था। शिकायत दर्ज थी। आशंका जताई गई थी। नाम भी बताए गए थे। लेकिन सुरक्षा नहीं मिली। और अब दो परिवारों के घरों में सन्नाटा दर्ज है।
2 फरवरी, सुबह करीब 10:30 बजे। देहरादून का व्यस्ततम इलाका पलटन बाजार से सटा मच्छी बाजार। दुकानों के शटर खुल चुके थे। भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। इसी भीड़ के बीच 23 साल की गुंजन श्रीवास्तव पर धारदार हथियार से हमला होता है। बीच बाजार। खुलेआम। और कुछ ही मिनटों में उसकी हत्या कर दी जाती है। गुंजन ने पहले ही पुलिस को बताया था कि आकाश कुमार उसे लगातार धमकियां दे रहा है। उसने लिखित शिकायत दी थी। अपनी जान को खतरा बताया था। परिजनों का आरोप है पुलिस ने शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया। सवाल यही है जब एक युवती थाने जाकर कहती है कि उसे डर है, तो क्या उस डर का कोई मूल्य नहीं होता? क्या सुरक्षा सिर्फ घटना के बाद की औपचारिकता है? हत्या के बाद आरोपी फरार हो गया। बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन गिरफ्तारी, क्या गुंजन को लौटा सकती है? पहली घटना की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि 11 फरवरी की सुबह तिब्बती मार्केट के पास गोलियों की आवाज़ ने शहर को फिर दहला दिया। 40 वर्षीय अर्जुन शर्मा को दिनदहाड़े गोली मार दी गई।
बताया जा रहा है कि अर्जुन ने भी अपनी जान को खतरा बताते हुए वसंत विहार थाने और पुलिस अधिकारियों को शिकायत दी थी। 30 से 40 करोड़ रुपये के लेनदेन से जुड़ा विवाद। नामजद आशंका। मुलाकातें। आवेदन। लेकिन पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिली। अर्जुन के दोस्त राजीव यादव कहते हैं, उसने पुलिस को बताया था कि उसकी जान को खतरा है। वह परेशान था। ऐसे ही हालात मेरे साथ भी हैं, मुझे भी धमकियां मिल रही हैं।
1991 से अर्जुन के साथ काम कर रहे विजय बताते हैं, अर्जुन और विनोद उनियाल के बीच पहले सब ठीक था। 2008 तक साथ बिजनेस भी किया। बाद में पैसे को लेकर विवाद हुआ। अर्जुन ने शिकायत दी थी, अधिकारियों से मिला भी था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। यहां भी वही सवाल अगर खतरे की सूचना थी, तो खतरे का आकलन क्यों नहीं हुआ? निगरानी क्यों नहीं हुई? रोकथाम क्यों नहीं हुई? आईजी गढ़वाल राजीव स्वरूप घटनास्थल पर पहुंचे। समीक्षा बैठक हुई। निर्देश जारी हुए। जीरो टॉलरेंस की नीति दोहराई गई। उन्होंने कहा यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही पाई गई तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी। यदि कोई फरियादी शिकायत लेकर आता है और समय पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह गंभीर लापरवाही मानी जाएगी। बयान सख्त है। शब्द मजबूत हैं। लेकिन सवाल वही है क्या ये निर्देश पहले नहीं थे? क्या हर शिकायत को गंभीरता से लेने की जिम्मेदारी पहले लागू नहीं थी?
इन दोनों मामलों में एक समानता है दोनों ने खतरे की आशंका जताई थी। दोनों ने पुलिस को बताया था।
दोनों अब जीवित नहीं हैं। जब कोई नागरिक थाने जाता है, तो वह सिर्फ कागज जमा नहीं करता वह अपनी सुरक्षा राज्य को सौंपता है। अगर वह सुरक्षा कागजों में ही रह जाए, तो फिर कानून का भरोसा किस काम का? देहरादून के बाजारों में व्यापारी डरे हुए हैं। छात्राएं असुरक्षित महसूस कर रही हैं। महिलाएं सवाल कर रही हैं क्या शिकायत करना ही काफी है? या शिकायत के बाद भी अपनी किस्मत से लड़ना होगा?

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14 दिन, 4 हत्याएं: राजधानी में भय का गणित

देहरादून जिले में बीते 14 दिनों के भीतर 4 हत्याएं

29 जनवरी: विकासनगर के ढालीपुर में 18 वर्षीय मनीषा तोमर की हत्या।

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31 जनवरी: ऋषिकेश के शिवाजी नगर में 32 वर्षीय प्रीति रावत की गोली मारकर हत्या।

2 फरवरी: मच्छी बाजार में 23 वर्षीय गुंजन श्रीवास्तव की गला रेतकर हत्या।

11 फरवरी: तिब्बती मार्केट के पास 40 वर्षीय अर्जुन शर्मा की गोली मारकर हत्या।

यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। ये चार घरों की रोशनी बुझने का हिसाब है। और यह राजधानी की कानून व्यवस्था पर लगा प्रश्नचिह्न है।

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