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जनगणना और चुनाव: क्या लोकतंत्र एक नई प्रशासनिक दक्षता की ओर बढ़ रहा है?, चुनाव पहले, जनगणना बाद में नहीं, दोनों साथ-साथ सफल हों, यही चुनौती

देहरादून/नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशालता है। दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव और दुनिया की सबसे बड़ी जनगणना दोनों ही ऐसे आयोजन हैं जिन पर पूरी दुनिया की नजर रहती है। अब जब अगले वर्ष फरवरी में जनगणना के दूसरे चरण की तैयारी शुरू होने जा रही है, तो केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के सामने एक नई प्रशासनिक चुनौती खड़ी हो गई है। चुनौती यह कि लोकतंत्र के दोनों महत्वपूर्ण पर्व बिना किसी बाधा के संपन्न हों। इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर और संभवतः उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव तय समय से कुछ महीने पहले कराने की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है। यदि ऐसा होता है तो यह केवल राजनीतिक फैसला नहीं होगा, बल्कि प्रशासनिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन का उदाहरण भी माना जाएगा।
जनगणना का दूसरा चरण 9 फरवरी से 28 फरवरी तक प्रस्तावित है। इस दौरान घर-घर जाकर सामाजिक और आर्थिक जानकारी एकत्र की जाएगी। इसके लिए लाखों सरकारी कर्मचारियों की आवश्यकता होगी।
केवल उत्तर प्रदेश में ही करीब 5.5 लाख कर्मचारियों की जरूरत बताई जा रही है। पंजाब में लगभग दो लाख और गोवा, मणिपुर तथा उत्तराखंड में करीब 50-50 हजार कर्मचारी इस कार्य में लगाए जाएंगे।
यही कर्मचारी चुनावी प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यदि दोनों कार्यक्रम एक ही समय पर आयोजित होते हैं तो प्रशासनिक दबाव बढ़ सकता है।
भारत में चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं हैं। यह नागरिक भागीदारी का सबसे बड़ा उत्सव है। दूसरी ओर जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं बल्कि भविष्य की नीतियों की आधारशिला है। स्कूल कहाँ बनेंगे, अस्पतालों की जरूरत कितनी है, किस क्षेत्र में रोजगार और सामाजिक योजनाओं की आवश्यकता है इन सभी निर्णयों का आधार जनगणना से मिलने वाला डेटा होता है। यानी एक तरफ मतदाता अपनी सरकार चुनता है, दूसरी तरफ नागरिक अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का दस्तावेज तैयार करता है। दोनों प्रक्रियाएं लोकतंत्र को मजबूत करती हैं।
सूत्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व ने अपनी राज्य इकाइयों को चुनावी तैयारियां समय से पहले पूरी करने के निर्देश दिए हैं। बूथ समितियों का गठन, संगठनात्मक नियुक्तियां और चुनावी रणनीति को जुलाई के पहले सप्ताह तक अंतिम रूप देने की बात कही गई है।
यह संकेत देता है कि राजनीतिक दल संभावित बदलावों को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियों को गति दे रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि विपक्षी दल भी इस संभावना को गंभीरता से ले रहे हैं। इंडिया गठबंधन की हालिया बैठक में भी इस विषय पर चर्चा हुई है। यानी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही प्रशासनिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बना रहे हैं।
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां अन्य राज्यों से अलग हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में जनगणना का कार्य सितंबर में ही पूरा किए जाने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में वहां समय से पहले चुनाव कराने की आवश्यकता कम हो सकती है।
यदि ऐसा होता है तो उत्तराखंड इस संभावित बदलाव से बाहर रह सकता है।
चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार मतदाता सूची इस प्रक्रिया में बड़ी बाधा नहीं बनेगी। विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया अंतिम चरण में है और आवश्यकता पड़ने पर अंतिम मतदाता सूची को तय समय से पहले भी प्रकाशित किया जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक तैयारियां पहले से की जा रही हैं। भारत में अक्सर चुनाव और प्रशासनिक कार्यों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती रहा है। लेकिन यदि जनगणना और चुनाव दोनों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए समय-सारिणी में बदलाव किया जाता है, तो इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की परिपक्वता और प्रशासनिक लचीलेपन के रूप में देखा जा सकता है। आखिरकार सवाल केवल चुनाव की तारीखों का नहीं है। सवाल यह है कि देश का लोकतंत्र और विकास, दोनों बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ें।
जनगणना से भविष्य की योजनाएं बनेंगी और चुनाव से भविष्य की सरकारें। भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में दोनों की सफलता समान रूप से महत्वपूर्ण है।

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