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देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में मुद्दों का अकाल पड़ जाए तो पुराने राजनीतिक घावों की फाइलें फिर खुल जाती हैं। जनता महंगाई, बेरोजगारी, पलायन और विकास की बात करे या न करे, लेकिन नेता अक्सर इतिहास के उन्हीं पन्नों में लौट जाते हैं जहां दल बदल, राजनीतिक विश्वासघात और व्यक्तिगत कटाक्ष दर्ज हैं।
इस बार बहस की शुरुआत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई। पोस्ट छोटी थी, लेकिन उसका राजनीतिक असर बड़ा हो गया। उन्होंने लिखा कि वे लंबे समय तक यह मानते रहे कि हेमवती नंदन बहुगुणा का बेटा विजय बहुगुणा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में नहीं जाएगा, लेकिन आखिरकार वह चला गया। यह टिप्पणी सीधे तौर पर वर्ष 2016 के उस राजनीतिक घटनाक्रम की याद दिलाती है जिसने उत्तराखंड की राजनीति की दिशा बदल दी थी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या दस साल पुराने राजनीतिक घटनाक्रम को बार-बार दोहराने से वर्तमान की राजनीति मजबूत होती है? या फिर यह केवल उस अतीत की याद दिलाता है जिसे जनता शायद पीछे छोड़ चुकी है।
हरीश रावत की टिप्पणी पर भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री और विजय बहुगुणा के पुत्र सौरभ बहुगुणा ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि हरीश रावत अब ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि उनकी हर बात को गंभीरता से लिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि हेमवती नंदन बहुगुणा का देश और उत्तराखंड की राजनीति में असाधारण योगदान रहा है। ऐसे व्यक्तित्व का नाम राजनीतिक कटाक्ष और आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बनाना उचित नहीं है।
सौरभ बहुगुणा की प्रतिक्रिया केवल अपने पिता के बचाव तक सीमित नहीं थी। उन्होंने यह संदेश भी देने की कोशिश की कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन दिवंगत नेताओं की विरासत को चुनावी हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।
दरअसल, वर्ष 2016 का राजनीतिक संकट उत्तराखंड के इतिहास का सबसे चर्चित अध्याय रहा है। कांग्रेस सरकार के दौरान विजय बहुगुणा समेत कई विधायकों के पार्टी छोड़ने से तत्कालीन सरकार संकट में आ गई थी। बाद में यही घटनाक्रम भाजपा के सत्ता में आने की बड़ी वजह बना। उस समय कांग्रेस ने इसे विश्वासघात कहा था, जबकि भाजपा ने इसे राजनीतिक परिवर्तन का नाम दिया।
आज एक दशक बाद वही कहानी फिर सामने लाई जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि पात्र वही हैं, लेकिन परिस्थितियां बदल चुकी हैं। प्रदेश के सामने रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और निवेश जैसे अनेक बड़े सवाल खड़े हैं। ऐसे समय में राजनीतिक विमर्श फिर दल बदल और पुराने आरोपों के इर्द-गिर्द घूमने लगा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल धीरे-धीरे बनना शुरू हो चुका है। ऐसे में पुराने राजनीतिक विवादों को फिर हवा दी जा रही है ताकि कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप से सक्रिय रखा जा सके। लेकिन जनता की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। मतदाता अब यह भी पूछना चाहता है कि पिछले दस वर्षों में किसने क्या किया और आगे क्या करने वाला है।
पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इस पूरे विवाद पर अभी तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि, हरीश रावत की टिप्पणी और सौरभ बहुगुणा के जवाब ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि उत्तराखंड की राजनीति में बहुगुणा परिवार का नाम आज भी राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।
सवाल अब यह नहीं है कि कौन किस दल में गया था। असली सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की राजनीति भविष्य के एजेंडे पर चलेगी या फिर अतीत की घटनाओं के सहारे ही नई राजनीतिक लड़ाइयां लड़ी जाएंगी। जनता शायद इसी जवाब का इंतजार कर रही है।

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