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रक्षाबंधन पर साल में एक बार नंदघर में विराजता है पवित्र सिंहासन, निसंतान महिलाएं रातभर दीप जलाकर करती हैं संतान प्राप्ति की कामना

देवीधुरा। चंपावत जिले का देवीधुरा स्थित मां बाराही धाम अपनी ऐतिहासिक बग्वाल और अनूठी धार्मिक परंपराओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां मां बाराही की मूल प्रतिमा से जुड़ी मान्यता श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का विषय है। स्थानीय मान्यता है कि आज तक किसी ने मां बाराही की मूल मूर्ति के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं किए हैं। श्रद्धालुओं के लिए मां का पवित्र सिंहासन ही आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है।
मान्यता के अनुसार मुगलकाल में आक्रांताओं ने मां बाराही की मूर्ति को लूटकर ले जाने का प्रयास किया था। इस दौरान क्षेत्र के लमगड़िया खाम के लोगों और सुनीगांव के बाड़ियों ने उनका मुकाबला कर मूर्ति वापस प्राप्त की। लोककथा के मुताबिक, कौतूहलवश आक्रांताओं ने दिन में मां बाराही की मूर्ति पर पड़ा वस्त्र हटाया तो तेज प्रकाश से उनकी आंखें चौंधिया गईं और उनकी दृष्टि चली गई। इसके बाद मां की मूल प्रतिमा को विशेष तांबे के सिंहासन में विराजमान करने की परंपरा शुरू हुई।
पवित्र सिंहासन में मां बाराही के साथ मां महाकाली और मां सरस्वती की मूर्तियां भी विराजमान हैं। वर्तमान में यह सिंहासन मंदिर की दूसरी मंजिल पर मां बाराही की अष्टभुजा प्रतिमा के समीप रखा जाता है। वर्ष में केवल एक बार रक्षाबंधन यानी बग्वाल के अवसर पर इसे मंदिर के समीप स्थित नंदघर में विराजमान किया जाता है।
इस अवसर पर मां के दर्शन और आशीर्वाद की कामना लेकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु नंदघर पहुंचते हैं। खासकर निसंतान महिलाएं निराजल उपवास रखकर रातभर हाथों में दीपक लेकर मां बाराही से संतान प्राप्ति की कामना करती हैं। श्रद्धालुओं के बीच इस परंपरा को लेकर गहरी आस्था है।
अगले दिन बागड़ जाति के व्यक्ति आंखों पर पट्टी बांधकर परंपरागत विधि-विधान से पवित्र मूर्तियों को गंगाजल और दूध से स्नान कराते हैं। इसके बाद मां को नए वस्त्र और आभूषण धारण कराए जाते हैं।
इसी अवसर पर मां बाराही की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। जयकारों के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालु शोभायात्रा में शामिल होते हैं। यात्रा मंदिर के समीप पहाड़ी पर स्थित मुचकंद ऋषि के आश्रम तक पहुंचती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार काल भैरव संग्राम में मुचकंद ऋषि ने देवताओं की सहायता की थी। इससे प्रसन्न होकर मां बाराही ने उन्हें चिरनिद्रा में लीन होने के बाद स्वयं दर्शन देने का वरदान दिया था। इसी लोकविश्वास के चलते सदियों से मां बाराही की शोभायात्रा मुचकंद ऋषि के आश्रम तक ले जाने की परंपरा चली आ रही है।
बाराही धाम की ये परंपराएं धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम हैं। हर वर्ष बग्वाल के दौरान देशभर से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए मां बाराही धाम की यह अनूठी परंपरा विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है।

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