
विश्व कप से पहले फुटबॉल विशेषज्ञ डॉ. वीरेन्द्र सिंह रावत का दर्द प्रतिभा हारी नहीं, व्यवस्था हार गई
देहरादून। दुनिया की निगाहें फुटबॉल के सबसे बड़े महाकुंभ पर टिक चुकी हैं। 11 जून से अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा की धरती पर फीफा विश्व कप 2026 का शोर गूंजने वाला है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी मैदान में उतरेंगे। करोड़ों लोग टीवी स्क्रीन से चिपके होंगे। गोल होंगे, जश्न होंगे, इतिहास लिखा जाएगा। लेकिन इस वैश्विक उत्सव के बीच भारत में एक सवाल फिर सिर उठाकर खड़ा हो गया है।
यह सवाल सिर्फ फुटबॉल प्रेमियों का नहीं है। यह सवाल उन लाखों युवाओं का भी है जो गांवों की धूल भरी जमीनों पर नंगे पैर फुटबॉल खेलते हुए बड़े होते हैं। यह सवाल उस व्यवस्था से भी है जो हर बार सपने दिखाती है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने का रास्ता नहीं बनाती।
पूर्व राष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी, रेफरी, अंतरराष्ट्रीय कोच और राज्य आंदोलनकारी डॉ. वीरेन्द्र सिंह रावत ने फीफा विश्व कप शुरू होने से ठीक पहले भारतीय फुटबॉल की स्थिति पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है। उनकी बातों में सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि वर्षों का अनुभव, संघर्ष और एक अधूरा सपना झलकता है।
डॉ. रावत कहते हैं कि भारत के पास प्रतिभा की कमी नहीं है। देश में युवा हैं। मैदान हैं। खेल सुविधाएं हैं। सरकारी योजनाएं भी हैं। फिर भी सवाल वही है कि आखिर भारत विश्व फुटबॉल के नक्शे पर अपनी पहचान क्यों नहीं बना पाया? उनका मानना है कि समस्या खिलाड़ियों में नहीं, बल्कि व्यवस्था में है। वह कहते हैं कि भारतीय फुटबॉल लंबे समय से राजनीति, गुटबाजी और स्वार्थों के बोझ तले दबा हुआ है। जिस खेल को गांव-गांव तक पहुंचना चाहिए था, वह फाइलों और बैठकों में उलझकर रह गया। फीफा विश्व कप 2026 कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रहा है। पहली बार 48 टीमें इसमें भाग लेंगी, पहली बार 104 मुकाबले खेले जाएंगे। दुनिया के सबसे बड़े सितारे एक मंच पर दिखाई देंगे। यह वही अवसर था जिसे लेकर वर्षों पहले उम्मीद जताई गई थी कि टीमों की संख्या बढ़ने से भारत के लिए विश्व कप तक पहुंचने का रास्ता कुछ आसान हो सकता है। डॉ. रावत याद दिलाते हैं कि उन्होंने 2018 में ही कहा था कि यदि भारत जमीनी स्तर पर फुटबॉल विकास की ठोस योजना बनाए तो 2026 तक विश्व कप क्वालीफिकेशन का सपना वास्तविकता में बदल सकता है।लेकिन आज 2026 आ गया है। विश्व कप भी आ गया है। भारत अब भी नहीं पहुंचा। फुटबॉल विश्व कप में ऐसे कई देश हिस्सा ले रहे हैं जिनकी आबादी भारत के किसी एक बड़े शहर से भी कम है। उनके पास भारत जितने संसाधन नहीं हैं। उनके पास विशाल बाजार नहीं है। उनके पास करोड़ों खिलाड़ियों का आधार भी नहीं है। फिर भी वे विश्व फुटबॉल में सम्मानजनक स्थान रखते हैं। यहीं से डॉ. रावत का दर्द और गहरा हो जाता है। वह कहते हैं कि भारत में फुटबॉल को कभी वह प्राथमिकता नहीं मिली जिसकी वह हकदार था। क्रिकेट की चमक के बीच फुटबॉल का भविष्य लगातार धुंधला होता गया। डॉ. रावत का कहना है कि उन्होंने वर्षों से देश के प्रधानमंत्री, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, खेल मंत्रियों और खेल संगठनों को लगातार सुझाव दिए। उन्होंने पत्र लिखे। नीतिगत सुधारों की मांग की। जमीनी ढांचे को मजबूत करने की बात कही। लेकिन उनकी नजर में अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए। उनका मानना है कि जब तक खेल संघों में पारदर्शिता, जवाबदेही और पेशेवर कार्य संस्कृति नहीं आएगी, तब तक भारतीय फुटबॉल की वास्तविक प्रगति मुश्किल है। डॉ. रावत का समाधान भी स्पष्ट है। उनका कहना है कि फुटबॉल का विकास बड़े शहरों की अकादमियों से नहीं, बल्कि गांवों की मिट्टी से होगा। यदि गांव, ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर मजबूत फुटबॉल नर्सरी बनाई जाए, नियमित प्रतियोगिताएं आयोजित हों, प्रशिक्षित कोच उपलब्ध हों और प्रतिभाओं को निष्पक्ष अवसर मिले, तो भारत का भविष्य बदला जा सकता है। उनके अनुसार खेल प्रशासन में ईमानदार और समर्पित लोगों को जिम्मेदारी देना भी उतना ही जरूरी है जितना खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देना।फीफा विश्व कप 2026 भारत के लिए एक और छूटा हुआ अवसर बनकर सामने है। लेकिन डॉ. रावत निराशा के बीच उम्मीद भी देखते हैं। उनका विश्वास है कि यदि अभी से गंभीर, सुनियोजित और ईमानदार प्रयास शुरू किए जाएं तो भारत 2034 तक फीफा विश्व कप में जगह बनाने का सपना साकार कर सकता है। यह सिर्फ फुटबॉल की बात नहीं है। यह उस व्यवस्था की बात है जो प्रतिभा को पहचानती है या नहीं। यह उस देश की बात है जो खेल को अधिकार मानता है या केवल आयोजन।
कुल मिलाकर जब दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल मंच पर मेस्सी, म्बाप्पे, हालैंड और अन्य सितारे चमकेंगे, तब भारत के करोड़ों फुटबॉल प्रेमी दर्शक बनकर तालियां बजाएंगे।
लेकिन एक सवाल उनके मन में जरूर गूंजेगा क्या भारत हमेशा विश्व कप देखने वाला देश बना रहेगा, या कभी विश्व कप खेलने वाला देश भी बनेगा? शायद यही सवाल डॉ. वीरेन्द्र सिंह रावत की पीड़ा का सार है। और शायद यही सवाल भारतीय फुटबॉल के भविष्य का भी।
