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हल्द्वानी: आंधी, बारिश और ओलों के कारण कुछ दिनों तक मौसम ने राहत दी थी। लोगों को लगा था कि गर्मी का तेवर अब धीमा पड़ जाएगा, लेकिन पिछले तीन दिनों में जिस तेजी से तापमान बढ़ा है, उसने साफ संकेत दे दिया है कि असली परीक्षा अभी बाकी है। पारा 40 डिग्री के पार पहुंच चुका है और मौसम विभाग ने 25 मई से 2 जून तक भीषण गर्मी तथा लू चलने की आशंका जताई है। दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के अनेक राज्यों में हीटवेव का अलर्ट जारी किया गया है। नौतपा की शुरुआत के साथ सूर्य की तपिश और अधिक तीखी हो जाती है। यह केवल मौसम परिवर्तन नहीं, बल्कि जनजीवन को प्रभावित करने वाली गंभीर स्थिति है।
गर्मी का असर अब केवल असुविधा तक सीमित नहीं रह गया है। अस्पतालों में डिहाइड्रेशन, चक्कर, उल्टी और हीट स्ट्रोक के मरीजों की संख्या बढ़ने लगी है। डॉक्टर लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि बच्चे, बुजुर्ग और पहले से बीमार लोग विशेष सावधानी बरतें। दोपहर के समय बाहर निकलना, पर्याप्त पानी न पीना और शरीर को लंबे समय तक धूप में रखना जानलेवा साबित हो सकता है। यह चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि हमारे यहां बड़ी आबादी आज भी ऐसे घरों में रहती है, जहां गर्मी से बचाव के पर्याप्त साधन नहीं हैं।
भीषण गर्मी के बीच बिजली कटौती लोगों की परेशानी को कई गुना बढ़ा देती है। पंखे और कूलर बंद होते ही घर भट्ठी जैसे महसूस होने लगते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और कठिन हो जाती है, जहां बिजली आपूर्ति पहले से ही अनियमित रहती है। शहरों में भी बढ़ती बिजली मांग के कारण ट्रिपिंग और कटौती आम बात बन जाती है। ऐसे समय में बिजली विभाग और प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि लोगों को राहत देने के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
इस हीटवेव का सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ता है, जिनके पास सिर छिपाने तक की जगह नहीं है। फुटपाथों पर रहने वाले, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक और खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने वाले लोग सबसे अधिक संकट में हैं। विडंबना यह भी है कि जिन लोगों के घर अतिक्रमण हटाने, सड़क चौड़ीकरण या न्यायालयों के आदेशों के चलते तोड़े गए, वे इस भीषण गर्मी में असुरक्षित जीवन जीने को मजबूर हैं। सरकार और प्रशासन को ऐसे लोगों के लिए अस्थायी आश्रय, पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था करनी चाहिए। गर्मी केवल मौसम की मार नहीं, सामाजिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा है।
हालांकि नौतपा को केवल संकट के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। भारतीय कृषि व्यवस्था और मानसून चक्र में इसका विशेष महत्व माना जाता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, नौतपा के दौरान जितनी अधिक गर्मी और शुष्कता पड़ती है, समुद्र का पानी उतनी तेजी से गर्म होता है। इससे बादल बनने की प्रक्रिया मजबूत होती है और अच्छे मानसून की संभावना बढ़ती है। खरीफ फसलों के लिए समय पर और पर्याप्त वर्षा अत्यंत आवश्यक होती है। इस दृष्टि से नौतपा की तपिश भविष्य की हरियाली की आधारशिला भी मानी जाती है।
प्रकृति का हर मौसम अपने साथ चुनौतियां और अवसर दोनों लेकर आता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम बदलते मौसम के अनुरूप अपनी जीवनशैली और व्यवस्थाओं को ढालें। भीषण गर्मी में शरीर को हाइड्रेट रखना, बार-बार पानी पीना, हल्का भोजन करना और धूप से बचना बेहद जरूरी है। बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि गर्मी का असर उन पर सबसे जल्दी होता है। समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि कोई भी व्यक्ति केवल मौसम की मार के कारण असहाय न रह जाए।
नौतपा की यह तपिश हमें केवल गर्मी का अहसास नहीं कराती, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि प्रकृति के सामने मानव कितना सीमित है। सावधानी, संवेदनशीलता और सामूहिक प्रयास ही इस चुनौती से निपटने का सबसे प्रभावी रास्ता हैं।

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