
छापे, गिरफ्तारी और बरामदगी के बाद भी कथित नकली आयुर्वेदिक दवा का कारोबार फिर शुरू होने के आरोप, अब फोन पर सलाह और ऑनलाइन भुगतान के जरिए मरीजों तक पहुंचने का दावा
दिनेशपूर: एक सवाल है। अगर किसी व्यक्ति के यहां हजारों पैकेट कथित नकली दवाएं बरामद हों, दवा बनाने की मशीनें मिलें, एलोपैथिक दवाओं का जखीरा मिले, अवैध हथियार मिलने का भी मामला दर्ज हो, प्रशासन उसे गिरफ्तार करे, गोदाम सील करे और पूरा मामला सुर्खियों में आए… तो क्या कहानी वहीं खत्म हो जाती है? या फिर कहानी वहीं से शुरू होती है? जनपद उधम सिंह नगर के दिनेशपुर में यही सवाल फिर खड़ा हो गया है। कुछ समय पहले प्रशासन, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त कार्रवाई में जिस कथित अवैध दवा निर्माण इकाई का भंडाफोड़ हुआ था, उसके संचालक कथित वैध स्वरूप सिंह अब जमानत पर जेल से बाहर हैं। आरोप है कि बाहर आते ही उन्होंने अपना कारोबार नए तरीके से शुरू कर दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब मरीज उनके सामने बैठकर नाड़ी नहीं दिखाते। अब सलाह मोबाइल फोन पर दी जाती है। दवा की कीमत ऑनलाइन ली जाती है। और दवा का पार्सल सीधे मरीज के घर पहुंच जाता है। यानी दुकान बदल गई है, लेकिन कारोबार के तरीके पर उठ रहे सवाल खत्म नहीं हुए हैं। विगत माह सोमवार के दिन की वह कार्रवाई आज भी लोगों को याद है। शिकायत मिलने के बाद गदरपुर की एसडीएम ऋचा सिंह ने खुद एक सामान्य महिला बनकर कथित वैद्य स्वरूप सिंह के पास पहुंचने का फैसला किया। उन्होंने खुद को शुगर की मरीज बताया। आरोप है कि बिना किसी चिकित्सकीय जांच के कथित वैध स्वरूप सिंह ने उन्हें दवा दे दी और उसके बदले में 1300 रुपये ले लिए। जैसे ही लेन-देन पूरा हुआ, पहले से तैयार प्रशासन, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम मौके पर पहुंच गई। इसके बाद जो बरामद हुआ, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। कथित तौर पर हजारों पैकेट आयुर्वेदिक दवाएं, दवा बनाने की मशीनें, बड़ी मात्रा में कच्चा माल, एलोपैथिक दवाओं का स्टॉक, खाली पैकेट, पैकिंग सामग्री, सात हिरण के सींग और एक अवैध पिस्तौल तक बरामद होने का दावा किया गया। उस समय प्रशासन ने आशंका जताई थी कि यह किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। लेकिन अब सवाल यह है कि यदि मामला इतना गंभीर था तो फिर वही कारोबार दोबारा कैसे शुरू हो गया? क्या निगरानी बंद हो गई? क्या जांच अभी अधूरी है? क्या मरीज फिर उसी जाल में फंस रहे हैं? या फिर कानून की रफ्तार इतनी धीमी है कि अवैध कारोबार को दोबारा खड़े होने का समय मिल जाता है? इन सवालों का जवाब सिर्फ प्रशासन के पास है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अब स्वरूप सिंह मरीजों से प्रत्यक्ष मुलाकात कम करते हैं। बताया जा रहा है कि मरीज पहले फोन पर अपनी बीमारी बताते हैं। उसके बाद कथित तौर पर ऑनलाइन माध्यम, विशेषकर गूगल पे के जरिए भुगतान लिया जाता है। भुगतान होने के बाद दवा कोरियर से भेजी जाती है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता।
यह डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कथित अवैध दवा कारोबार का नया मॉडल बन जाता है। सबसे बड़ा खतरा उस मरीज को है जो वर्षों से शुगर, ब्लड प्रेशर या दूसरी गंभीर बीमारी से परेशान है। जो जल्दी ठीक होने की उम्मीद में गारंटी, जड़ से इलाज और चमत्कारी दवा जैसे दावों पर भरोसा कर लेता है। बीमारी जितनी पुरानी होती है, उम्मीद उतनी ही कमजोर हो जाती है। और इसी कमजोरी को कुछ लोग अपना कारोबार बना लेते हैं। यदि किसी व्यक्ति पर पहले से गंभीर आरोप हैं और जांच जारी है, तो संबंधित विभागों की जिम्मेदारी केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं हो सकती। जरूरी यह भी है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि कथित अवैध कारोबार दोबारा शुरू न हो। यदि ऑनलाइन माध्यम से बिक्री हो रही है, तो उसकी भी जांच होनी चाहिए। यदि कोरियर के जरिए दवाएं भेजी जा रही हैं, तो उसकी भी पड़ताल जरूरी है। यदि मरीजों से फोन पर संपर्क किया जा रहा है, तो उस नेटवर्क की भी जांच होनी चाहिए। कुल मिलाकर यह खबर सिर्फ स्वरूप सिंह की नहीं है। यह खबर उस भरोसे की है जिसे लोग बीमारी के समय किसी भी उम्मीद के नाम पर सौंप देते हैं। यह खबर उस व्यवस्था की भी है, जिसे यह तय करना है कि छापेमारी सिर्फ एक दिन की कार्रवाई होगी या कानून का असर लंबे समय तक दिखाई देगा। क्योंकि सवाल आज भी वहीं खड़ा है अगर कथित नकली दवा का कारोबार सचमुच दोबारा शुरू हो गया है, तो कार्रवाई दोबारा कब होगी?
