
राजेश सरकार
देहरादून। पहाड़ों में मौसम अचानक बदल जाता है। बादल आते हैं, बरसते हैं और फिर धूप निकल आती है। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में एक दौर ऐसा भी रहा, जब मौसम से ज्यादा तेजी से मुख्यमंत्री बदलते थे। राज्य बनने के बाद से लेकर आज तक उत्तराखंड ने 12 मुख्यमंत्री देखे हैं। किसी को जनता ने सत्ता से बाहर किया, किसी को अपनी ही पार्टी ने। कोई चुनाव हार गया, कोई संगठन की नाराजगी का शिकार हुआ, तो किसी को संवैधानिक परिस्थितियों ने कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। अब जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार दूसरे कार्यकाल में सरकार चला रहे हैं और राज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार मुख्यमंत्री रहने की ओर बढ़ रहे हैं, तब पीछे मुड़कर देखना जरूरी हो जाता है कि आखिर उत्तराखंड की राजनीति ने इन 26 वर्षों में क्या-क्या देखा। 9 नवंबर 2000, उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड एक नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। लोगों के सामने उम्मीदों का पहाड़ था। बेहतर प्रशासन, रोजगार, पलायन पर रोक और पहाड़ के अनुरूप विकास का सपना था। भाजपा ने वरिष्ठ नेता नित्यानंद स्वामी को पहला मुख्यमंत्री बनाया। प्रशासनिक अनुभव उनके पक्ष में था, लेकिन राज्य आंदोलन से जुड़े कई लोगों को लगा कि आंदोलन का नेतृत्व करने वाले किसी चेहरे को यह जिम्मेदारी मिलनी चाहिए थी। धीरे-धीरे पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की मांग तेज होने लगी। करीब एक साल बाद नित्यानंद स्वामी की जगह भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। संगठन को उम्मीद थी कि कोश्यारी के नेतृत्व में पार्टी 2002 का चुनाव जीत जाएगी, लेकिन जनता ने अलग फैसला सुनाया और पहली निर्वाचित सरकार कांग्रेस की बनी। 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता में आई। मुख्यमंत्री पद के लिए हरीश रावत का नाम सबसे आगे माना जा रहा था, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने अनुभवी नेता नारायण दत्त तिवारी पर भरोसा जताया।
यहीं से उत्तराखंड कांग्रेस में दो समानांतर केंद्र दिखाई देने लगे। सरकार का नेतृत्व एनडी तिवारी के हाथ में था, जबकि संगठन में हरीश रावत की पकड़ मजबूत बनी रही। दोनों नेताओं के राजनीतिक रिश्ते लगातार चर्चा का विषय रहे।
एनडी तिवारी सरकार को आज भी औद्योगिक विकास के दौर के रूप में याद किया जाता है। सिडकुल परियोजनाओं ने राज्य में उद्योगों की नई शुरुआत की। बड़े निवेश आए और रोजगार की उम्मीदें जगीं। लेकिन इसी कार्यकाल में लालबत्ती संस्कृति को लेकर सरकार की आलोचना भी हुई।
लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी का चर्चित गीत नौ छमी नारैणा भी उसी दौर की राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बना। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2007 के चुनाव में जनता के बीच बने माहौल में इस गीत ने भी अपनी भूमिका निभाई। इतिहास में एनडी तिवारी पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री और पहले ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज हुए, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया।
2007 में भाजपा सत्ता में लौटी और पूर्व सेना अधिकारी मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। उनकी पहचान सख्त प्रशासन, अनुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रवैये की थी। नौकरशाही पर नियंत्रण और पारदर्शिता को लेकर उन्होंने कई फैसले लिए। लेकिन राजनीति केवल प्रशासनिक छवि से नहीं चलती। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पार्टी नेतृत्व को लगा कि सरकार का राजनीतिक प्रबंधन कमजोर पड़ रहा है। नतीजा यह हुआ कि अचानक नेतृत्व बदल दिया गया और रमेश पोखरियाल निशंक मुख्यमंत्री बनाए गए। भाजपा के भीतर यह फैसला लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा।
रमेश पोखरियाल निशंक ने संगठन और कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उनका कार्यकाल कई विवादों से घिरा रहा। खनन, भूमि आवंटन, कुंभ मेले की व्यवस्थाओं और प्रशासनिक फैसलों को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर रहा। चुनाव नजदीक आते-आते भाजपा के भीतर भी बेचैनी बढ़ने लगी। इसी दौरान नरेंद्र सिंह नेगी का एक और राजनीतिक व्यंग्य गीत अब कथगा खैल्यो चर्चा में आया। 2011 में भाजपा ने एक बार फिर नेतृत्व बदल दिया। चुनाव से पहले भुवन चंद्र खंडूड़ी की वापसी हुई और नारा दिया गया खंडूड़ी है जरूरी।
लेकिन इस बार भी नेतृत्व परिवर्तन भाजपा को सत्ता में वापस नहीं ला सका। 2012 में कांग्रेस फिर सरकार बनाने में सफल रही।
2012 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए फिर हरीश रावत का नाम चर्चा में था, लेकिन नेतृत्व ने विजय बहुगुणा को जिम्मेदारी सौंपी।
शुरुआती दौर अपेक्षाकृत शांत रहा, लेकिन जून 2013 में आई केदारनाथ आपदा ने पूरे राज्य की राजनीति बदल दी। हजारों लोगों की जान गई, लाखों प्रभावित हुए और सरकारी तंत्र अभूतपूर्व संकट में आ गया। राहत और बचाव कार्यों को लेकर सरकार की आलोचना हुई। विपक्ष के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर भी असंतोष बढ़ने लगा। अंततः फरवरी 2014 में विजय बहुगुणा को पद छोड़ना पड़ा।
करीब एक दशक के लंबे इंतजार के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री बने। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर का असंतोष था। 2016 में कांग्रेस के नौ विधायक बागी हो गए। सरकार का बहुमत संकट में आ गया। राष्ट्रपति शासन लगा। मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। फ्लोर टेस्ट हुआ और अंततः हरीश रावत दोबारा मुख्यमंत्री बने। यह पूरा घटनाक्रम उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास के सबसे नाटकीय अध्यायों में गिना जाता है। लेकिन राजनीतिक नुकसान कांग्रेस का हो चुका था। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया।
2017 में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल का सबसे चर्चित फैसला गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करना और उसे कमिश्नरी का दर्जा देना रहा। हालांकि इस फैसले को लेकर पार्टी और सरकार के भीतर भी मतभेद सामने आए। धीरे-धीरे नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी की शिकायतें भी बढ़ने लगीं। 2021 आते-आते भाजपा ने चुनाव से ठीक पहले नेतृत्व बदलने का फैसला किया और तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बने। लेकिन उनका कार्यकाल बेहद छोटा साबित हुआ। कुछ सार्वजनिक बयान राष्ट्रीय बहस का विषय बने। दूसरी ओर संवैधानिक स्थिति ऐसी बनी कि वे समय रहते विधानसभा के सदस्य नहीं बन सके। करीब चार महीने बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। जुलाई 2021 में भाजपा ने युवा चेहरे पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया। उस समय इसे चुनावी प्रयोग माना गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटी। उत्तराखंड के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि सत्ता विरोधी परंपरा टूट गई।
दिलचस्प बात यह रही कि भाजपा चुनाव जीत गई, लेकिन धामी अपनी खटीमा सीट हार गए। इसके बावजूद पार्टी ने नेतृत्व नहीं बदला और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया। बाद में चंपावत उपचुनाव जीतकर उन्होंने विधानसभा में वापसी की। अपने कार्यकाल में धामी सरकार ने समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, निवेश सम्मेलन और सख्त भू-कानून जैसे फैसलों के जरिए अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की।
उत्तराखंड के शुरुआती दो दशकों में मुख्यमंत्री बदलना लगभग राजनीतिक परंपरा बन चुका था। सत्ता परिवर्तन, संगठनात्मक फैसले, बगावत, आपदाएं, चुनावी समीकरण और संवैधानिक संकट इन सभी ने राज्य की राजनीति को प्रभावित किया। नित्यानंद स्वामी से लेकर पुष्कर सिंह धामी तक की यात्रा केवल 12 मुख्यमंत्रियों की सूची नहीं है। यह उस राज्य की राजनीतिक कहानी है, जिसने हर कुछ वर्षों में नया नेतृत्व देखा और हर बार नई उम्मीदें भी बांधीं। अब पहली बार ऐसा दिखाई देता है कि उत्तराखंड स्थिर नेतृत्व के एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है। यदि यह क्रम जारी रहता है, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की राजनीति को बार-बार बदलते मुख्यमंत्रियों के लिए नहीं, बल्कि स्थिर नेतृत्व के नए अध्याय के लिए याद किया जा सकता है।
लेकिन अंतिम फैसला इतिहास नहीं करता, जनता करती है। और लोकतंत्र में जनता का फैसला हर चुनाव के साथ एक नया अध्याय लिखता है।
