
कुर्सियों की अदला-बदली, और नीतियों की नई पटकथा
राजेश सरकार
देहरादून: उत्तराखंड के वन विभाग में इन दिनों बदलाव सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी कहानी बनता दिख रहा है जिसमें वरिष्ठता, अनुभव, प्रतिनियुक्ति और भविष्य की नीतियों की परछाइयाँ एक साथ चल रही हैं। प्रमुख वन संरक्षक (हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स) यानी पीसीसीएफ हॉफ के पद पर नए चेहरे की ताजपोशी लगभग तय मानी जा रही है और इसके साथ ही विभाग के भीतर सत्ता-संतुलन का पूरा नक्शा बदलने की तैयारी है। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में हुई विभागीय पदोन्नति समिति ( डीपीसी) की बैठक इस बदलाव की निर्णायक कड़ी साबित हुई है। बैठक में शीर्ष अधिकारियों के नामों पर विस्तार से विचार हुआ और संकेत साफ हैं कि विभाग अब वरिष्ठता के आधार पर नेतृत्व परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है।
बैठक में जिन नामों पर चर्चा हुई, उनमें कपिल लाल, नीना ग्रेवाल और एसपी सुबुद्धि प्रमुख हैं। तीनों ही भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के वरिष्ठ अधिकारी हैं, लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है। सरकार का झुकाव इस बार वरिष्ठता को प्राथमिकता देने की ओर बताया जा रहा है।
कपिल लाल 1993 बैच के सबसे वरिष्ठ अधिकारियों में से एक हैं और उनका नाम सबसे आगे माना जा रहा है। प्रशासनिक हलकों में उन्हें एक सख्त और परिणामोन्मुख अधिकारी के रूप में देखा जाता है। खास बात यह भी है कि उनके खिलाफ किसी प्रकार की विभागीय जांच या कार्रवाई लंबित नहीं है, जो उनकी दावेदारी को और मजबूत बनाता है। यदि कपिल लाल नए पीसीसीएफ हॉफ बनते हैं तो यह नियुक्ति केवल एक पद परिवर्तन नहीं होगी, बल्कि एक लंबी प्रशासनिक अवधि की शुरुआत होगी। उनका कार्यकाल वर्ष 2031 तक है, यानी लगभग पांच वर्षों तक वे विभाग की दिशा तय कर सकते हैं। यह वह समय है जब विभाग को न केवल रोज़मर्रा के संचालन बल्कि दीर्घकालिक वन नीति, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी रणनीतियों और वन संरक्षण की नई रूपरेखा तैयार करनी होगी। वर्तमान में विभाग की कमान संभाल रहे रंजन कुमार मिश्र 30 जून को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनके जाने के बाद नेतृत्व का यह बदलाव लगभग औपचारिक रूप ले लेगा। माना जा रहा है कि 1 जुलाई से नए नेतृत्व के रूप में कपिल लाल कार्यभार संभाल सकते हैं।
लेकिन कहानी केवल शीर्ष पद तक सीमित नहीं है। विभाग के भीतर कई और पदों पर भी फेरबदल की भूमिका बन रही है। वन विभाग के भीतर वन्यजीव, कैंपा, नियोजन और वन पंचायत जैसे महत्वपूर्ण प्रभागों को लेकर भी पुनर्संरचना की चर्चा तेज है। अभी कपिल लाल के पास ही कुछ महत्वपूर्ण प्रभार हैं, जबकि नीना ग्रेवाल वन विकास निगम में प्रबंध निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। वन्यजीव जैसे संवेदनशील विभागीय पद को लेकर भी अंदरखाने चर्चा तेज है, और इसे विभाग के सबसे प्रतिष्ठित पदों में से एक माना जाता है।
वरिष्ठता के क्रम में नीना ग्रेवाल और एसपी सुबुद्धि भी मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। दोनों के पास अनुभव और प्रशासनिक कार्यकुशलता का लंबा रिकॉर्ड है। ऐसे में यदि किसी कारणवश नेतृत्व परिवर्तन की पहली पसंद आगे नहीं बढ़ती, तो यही नाम विकल्प के रूप में उभर सकते हैं।
जैसे-जैसे शीर्ष पद बदलते हैं, वैसे-वैसे नीचे की कुर्सियाँ भी खाली होंगी। यही वह बिंदु है जहां विभागीय फेरबदल का दूसरा चरण शुरू होता है। फील्ड स्तर पर वन संरक्षकों और मुख्य वन संरक्षकों के तबादलों की सूची पहले से तैयार बताई जा रही है, हालांकि अंतिम निर्णय नए मुखिया की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर उत्तराखंड वन विभाग में यह बदलाव महज एक प्रशासनिक रूटीन नहीं है। यह उस व्यवस्था का पुनर्संयोजन है, जिसमें अनुभव, वरिष्ठता और नीतिगत दृष्टि तीनों एक साथ टकरा भी रहे हैं और संतुलन भी बना रहे हैं।
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह बदलाव विभाग को स्थिरता देगा या फिर नई प्राथमिकताओं के साथ एक नए प्रशासनिक दौर की शुरुआत करेगा। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड के जंगलों की देखरेख करने वाली व्यवस्था खुद एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है।
