
2027 की सत्ता का सपना, लेकिन पुराने सिपाहियों की अनदेखी से भीतर ही भीतर बढ़ रही नाराजगी, हरीश मेहता, एनबी गुणवंत समेत कई वरिष्ठ चेहरों को संगठन में जिम्मेदारी नहीं मिलने से चर्चाएं तेज
हल्द्वानी। कांग्रेस 2027 में उत्तराखंड की सत्ता में वापसी का दावा कर रही है। शुक्रवार को हल्द्वानी में पार्टी के बड़े नेताओं ने भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार, खनन, बेरोजगारी और जनविरोधी नीतियों के आरोप लगाए। मिशन-2027 की तैयारियों का ऐलान हुआ और पार्टी ने निष्ठावान व जिताऊ कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने की बात कही। लेकिन कांग्रेस की इस चमकदार चुनावी तस्वीर के पीछे संगठन के भीतर से एक दूसरा सवाल भी उठ रहा है क्या 2027 की लड़ाई कांग्रेस अपने पुराने सिपाहियों के साथ लड़ेगी या उन चेहरों के साथ जिन्हें हाल में संगठन में तरजीह दी जा रही है?
पार्टी के भीतर संगठनात्मक जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर वरिष्ठ नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी की चर्चाएं तेज हैं। हल्द्वानी के वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश मेहता और एनबी गुणवंत जैसे पुराने चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नहीं मिलने को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठ रहे हैं। ये वही नेता हैं जो वर्षों से पार्टी की जमीन तैयार करने में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में संगठन में उनकी भूमिका सीमित दिखाई देने को लेकर कांग्रेस के भीतर असहजता की स्थिति बनने की चर्चा है। बीते शुक्रवार की पत्रकार वार्ता में कांग्रेस नेताओं ने भाजपा के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी का दावा किया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि असंतोष विधायकों के खिलाफ नहीं बल्कि राज्य और केंद्र सरकार के खिलाफ है। लेकिन अब कांग्रेस के सामने भी एक असहज सवाल खड़ा हो गया है जब पार्टी खुद अपने वरिष्ठ नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर नहीं कर पा रही तो 2027 में भाजपा के खिलाफ एकजुट लड़ाई कैसे लड़ेगी?
राजनीति में संगठन ही चुनाव की असली मशीनरी होता है। मंच पर बड़े नेताओं के भाषण और रैलियों की भीड़ दिखाई देती है, लेकिन चुनाव बूथ पर पुराने कार्यकर्ताओं के नेटवर्क से लड़ा जाता है। यही वजह है कि संगठन में लंबे समय से सक्रिय नेताओं की अनदेखी की चर्चा कांग्रेस के लिए सामान्य संगठनात्मक फेरबदल से कहीं बड़ा राजनीतिक सवाल बन सकती है।
कांग्रेस के भीतर असंतोष की चर्चाओं को उस समय और हवा मिली जब पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और उत्तराखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता गोविंद सिंह कुंजवाल के भतीजे की पार्टी से दूरी बढ़ने की चर्चाएं सामने आईं। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार में दर्जाधारी मंत्री रह चुके कुंजवाल के भतीजे पार्टी में अपनी अनदेखी से नाराज बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि वह कांग्रेस छोड़कर उत्तराखंड क्रांति दल का दामन थाम सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी कोई औपचारिक घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए इसे फिलहाल पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं और संभावित राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में ही देखा जा रहा है।
लेकिन सवाल बड़ा है अगर कांग्रेस के पुराने राजनीतिक परिवारों से जुड़े चेहरे ही खुद को उपेक्षित महसूस करने लगें तो मिशन-2027 का संदेश नीचे तक क्या जाएगा? नई टीम बनाने की कवायद या पुराने चेहरों से दूरी? कांग्रेस नेतृत्व लगातार कह रहा है कि इस बार टिकट निष्ठावान और जिताऊ कार्यकर्ताओं को मिलेगा। संगठन को मजबूत करने की बात हो रही है। चुनावी समितियां बनाई जा रही हैं। बड़े नेताओं के दौरे और रैलियों का सिलसिला शुरू हो गया है। लेकिन दूसरी तरफ संगठन में जिम्मेदारियों को लेकर उठ रहे सवाल इस दावे की परीक्षा भी ले रहे हैं। कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ भाजपा को हराने की नहीं है। चुनौती अपने भीतर यह भरोसा बनाए रखने की भी है कि वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता खत्म नहीं हुई है। क्योंकि जिस कार्यकर्ता ने दस, बीस, तीस या चालीस साल पार्टी के झंडे के नीचे गुजारे हों, उसे सिर्फ चुनाव के समय याद करना और फिर संगठन में जगह न देना यह संदेश अगर कार्यकर्ताओं के बीच गया तो उसका असर चुनावी गणित पर पड़ सकता है। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव भले अभी समय दूर हो, लेकिन दोनों प्रमुख दलों में चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। कांग्रेस भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में जुटी है और भाजपा भी अपने स्तर पर संगठन को चुनावी मोड में ले जा रही है। ऐसे समय में कांग्रेस के पुराने नेताओं में असंतोष की खबरें पार्टी के लिए चिंता का कारण बन सकती हैं।
कल तक कांग्रेस भाजपा से पूछ रही थी आपके अपने विधायक आपके साथ हैं या नहीं? अब राजनीति कांग्रेस से पूछ रही है आपके अपने पुराने नेता आपके साथ कितने हैं?
2027 में कांग्रेस सत्ता में लौटेगी या नहीं, यह जनता तय करेगी। लेकिन उससे पहले कांग्रेस को अपने संगठन के भीतर एक सवाल का जवाब देना होगा क्या मिशन-2027 में पुराने सिपाहियों के लिए भी कोई मिशन है?
क्योंकि सत्ता का रास्ता सिर्फ रामलीला मैदान की रैली से नहीं जाता। वह उन गलियों, बूथों और कार्यकर्ताओं के बीच से होकर जाता है, जिन्हें चुनाव से पहले नहीं, पूरे पांच साल साथ रखना पड़ता है।
