
नयना गांव की छोटी दुकान से निकला बड़ा सवाल: क्या अब हर थाली के साथ टैक्स की पर्ची भी परोसी जाएगी?
नैनीताल। पहाड़ों में अक्सर लोग दूर-दूर से प्राकृतिक सौंदर्य देखने आते हैं। कोई झील देखने आता है, कोई बादलों को छूने। लेकिन हल्द्वानी-नैनीताल हाईवे पर नयना गांव के पास एक ऐसी जगह भी है, जहां लोग मटन-चावल की खुशबू के पीछे खिंचे चले आते हैं। सड़क किनारे की यह साधारण सी दुकान अचानक चर्चा में आ गई है। वजह मटन का स्वाद नहीं, बल्कि जीएसटी है। जी हां, अब पहाड़ी मटन-चावल की इस दुकान पर सिर्फ मटन और चावल नहीं बिकेंगे, बल्कि हर प्लेट के साथ टैक्स व्यवस्था की मौजूदगी भी महसूस होगी।
बता दें कि कुछ दिन पहले जीएसटी विभाग की टीम यहां पहुंची। जांच हुई। कागज देखे गए। हिसाब-किताब पर नजर डाली गई। पता चला कि दुकान का जीएसटी पंजीकरण नहीं है। विभाग ने दुकान का सालाना कारोबार करीब 50 लाख रुपये आंका। इसके बाद संचालक चंदन सिंह को नोटिस दिया गया और 12 जून तक पंजीकरण कराने के निर्देश दिए गए। नोटिस के बाद कार्रवाई हुई। दुकान संचालक ने जीएसटी पंजीकरण करा लिया। अब इस दुकान से मटन-चावल खाने वाले ग्राहकों को जीएसटी नंबर वाला पक्का बिल मिलेगा। असिस्टेंट कमिश्नर प्रकाश त्रिवेदी के अनुसार मीट-चावल की बिक्री पर पांच प्रतिशत जीएसटी देय है। कारोबार के आकलन के आधार पर करीब 2.5 लाख रुपये तक कर देनदारी बन सकती है। यह खबर सिर्फ एक मटन-चावल की दुकान की नहीं है। यह उस बदलते भारत की कहानी भी है, जहां सड़क किनारे की छोटी दुकानें भी अब औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रही हैं।
पहाड़ के किसी गांव में बैठा दुकानदार सोच रहा होगा कि उसके ग्राहकों को मटन ज्यादा पसंद है या बिल पर छपा जीएसटी नंबर। दूसरी तरफ सरकार का तर्क है कि कारोबार चाहे छोटा हो या बड़ा, कर व्यवस्था में सभी की भागीदारी जरूरी है। पहले लोग पूछते थे भाई, मटन कितना बढ़िया है? अब शायद पूछेंगे बिल देना मत भूलना। नयना गांव की इस दुकान पर चूल्हा पहले भी जलता था, आज भी जल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उस चूल्हे की आंच पर पक रहे मटन के साथ-साथ टैक्स व्यवस्था का एक नया अध्याय भी परोसा जा रहा है। और पहाड़ की उस छोटी सी दुकान ने एक बार फिर याद दिला दिया है कि भारत की अर्थव्यवस्था सिर्फ बड़े मॉल और कॉरपोरेट दफ्तरों में नहीं, बल्कि सड़क किनारे धुएं से काली हुई उन रसोइयों में भी बसती है, जहां एक प्लेट मटन-चावल लोगों को बार-बार लौटने पर मजबूर कर देती है।
