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चंपावत में आज जंगल सिर्फ पेड़ों की बात नहीं कर रहा था, जंगल इंसानों की चिंता भी बोल रहा था। उत्तराखंड के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक रंजन कुमार मिश्र दो दिवसीय दौरे पर चंपावत पहुँचे और वन विभाग परिसर में आयोजित प्रभाग दिवस में सीधे उन लोगों की बात सुनी, जिनकी ज़िंदगी जंगल के साथ रोज़ टकराती है।
यह कोई साधारण बैठक नहीं थी। यह वह मंच था जहाँ वन पंचायतों के सरपंच, सदस्य और आम ग्रामीण अपने सवाल लेकर पहुँचे थे जंगली जानवरों का डर, फसलों की बर्बादी, तारबाड़ की कमी, पानी की समस्या और अपने हक़-हकूक की लड़ाई। सवाल सीधे थे और आवाज़ों में पीड़ा भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
प्रमुख मुख्य वन संरक्षक रंजन कुमार मिश्र ने एक-एक समस्या को गंभीरता से सुना। मानव-वन्यजीव संघर्ष पर चर्चा सिर्फ औपचारिक नहीं रही, बल्कि इसे रोकने के लिए ठोस प्रयासों का भरोसा भी दिया गया। उन्होंने साफ कहा कि जंगल और इंसान के बीच बढ़ता टकराव किसी एक की समस्या नहीं, यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
चंपावत से शुरू की गई यह प्रभाग दिवस की पहल अब पूरे उत्तराखंड में लागू की जाएगी। यानी अब जंगल से जुड़े फैसले सिर्फ फाइलों में नहीं, ज़मीन पर रहने वाले लोगों की बात सुनकर लिए जाएंगे कम से कम दावा यही है।
इससे पहले शनिवार को प्रमुख वन संरक्षक ने टनकपुर में एनएचपीसी के पावर स्टेशन का दौरा किया। विद्युत गृह, स्विच यार्ड, बैराज परिसर और भारत-नेपाल नहर का निरीक्षण किया। विकास और पर्यावरण के इस जटिल रिश्ते को भी समझने की कोशिश की गई।
बैठक में वन पंचायत प्रतिनिधियों ने साफ कहा कि अगर वन्यजीव संघर्ष ऐसे ही बढ़ता रहा, तो खेती और जीवन दोनों संकट में पड़ जाएंगे। इस पर प्रमुख वन संरक्षक ने वन विभाग को निर्देश दिए कि रोकथाम के लिए हर संभव कदम उठाए जाएं और समाधान सिर्फ कागज़ों तक सीमित न रहें।
चंपावत की इस बैठक में एक बात साफ दिखी जंगल अब चुप नहीं है। और अगर प्रशासन सच में सुन रहा है, तो शायद आने वाले दिनों में जंगल और इंसान के बीच का फासला थोड़ा कम हो सके। सवाल बस इतना है कि यह भरोसा ज़मीन पर कब दिखेगा।

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