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उत्तराखण्ड वन विकास निगम में ईएसआईसी का पुराना मामला, सवालों के घेरे में सिस्टम

राजेश सरकार
देहरादून। यह कहानी सिर्फ एक बैंक खाते के सीज होने की नहीं है। यह कहानी है सरकारी दफ्तरों की फाइलों में दबी लापरवाही, अधूरी नोटशीटों और उन सवालों की, जिनके जवाब सालों से किसी ने ढूंढने की कोशिश ही नहीं की।
उत्तराखण्ड वन विकास निगम का यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, सर्वे ऑफ इंडिया, राजपुर रोड स्थित खाता खाता संख्या 535001010260107 कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) ने सीज कर दिया है। वजह बताई जा रही है वर्ष 2014 से पहले का ईएसआई बकाया। लेकिन जैसे-जैसे फाइलें खुल रही हैं, मामला सीधा नहीं, बल्कि उलझता चला जा रहा है।
गौरतलब है कि उक्त कहानी वर्ष 2009 से शुरू हुई। हरिद्वार प्रभागीय लॉगिंग कार्यालय में 27 जुलाई 2014 को ईएसआईसी के बीमा निरीक्षक के लिए आते हैं। निरीक्षण में वर्ष 2009 से 2013 के बीच कार्यरत नियमित कर्मचारियों के वेतन अभिलेख देखे जाते हैं। जांच में पता चला कि ईएसआई अंशदान समय पर जमा नहीं किया गया।
ईएसआईसी 27.28 लाख रुपये के वेतन पर 6.5 प्रतिशत की दर से 1.77 लाख रुपये की देयता तय करता है। इसके बाद इसमें 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज जुड़ता है। नतीजा आज कुल देय राशि 4,58,270.25 रुपये हुई। उक्त राशि जमा नहीं होती और अंततः बैंक का खाता सीज। मामले को सुलझाने के लिए 24 मार्च 2025 को ईएसआईसी के वसूली एवं राजस्व अधिकारियों से बैठक होती है। इस बैठक में ईपीएफ ट्रस्ट के सचिव और हरिद्वार लॉगिंग प्रभाग के अधिकारी मौजूद रहते हैं। ईएसआईसी साफ कह देता है
नियमित कर्मचारियों पर ईएसआई लागू है। ब्याज बढ़ता रहेगा। पूरी राशि चुकाइए, तभी खाता खुलेगा। गढ़वाल क्षेत्र के क्षेत्रीय प्रबंधक शेर सिंह प्रबंध निदेशक से 4.58 लाख रुपये की वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति मांगते हैं। मामला सीधा लगता है। लेकिन यहीं से कहानी दूसरा मोड़ लेती है।
निगम मुख्यालय से ईपीएफ ट्रस्ट को भेजे गए पत्र में एक चौंकाने वाली बात सामने आती है। ईपीएफ ट्रस्ट की नोटशीट संख्या-27 (दिनांक 25 जनवरी 2025) में दर्ज है ईएसआईसी के पत्रांक-241, दिनांक 7 अप्रैल 2016 में मांग दिखाई गई 1,29,374 रुपये की तथा उसी नोटशीट में उल्लेख है कि 67,29,880 रुपये की राशि ईएसआईसी द्वारा खातों से आहरित हो गई। अब यहां सवाल य़ह उठता है कि जब मांग सवा एक लाख की थी, तो खाते से 67 लाख रुपये कैसे निकल गए? और अगर निकले, तो कहां गए? इसके बाद मुख्यालय स्तर पर जांच शुरू होती है। ईपीएफ ट्रस्ट बताता है कि 9 जनवरी 2025 को ईएसआईसी प्रेमनगर, देहरादून का प्रोहिबिटरी ऑर्डर व्हाट्सएप से मिला। फाइलें टटोली जाती हैं। तो पता चलता है कि उत्तराखण्ड गठन से फरवरी 2019 तक ईएसआईसी का काम अधिष्ठान अनुभाग देखता रहा। 14 फरवरी 2019 के बाद फाइल ईपीएफ अनुभाग को दी गई। कुल 29 नोटशीट में से नोटशीट संख्या-3 पर किसी अधिकारी के हस्ताक्षर ही नहीं हैं। उसी नोटशीट में 2 अप्रैल 2014 के एक पत्र के हवाले से 67.29 लाख रुपये के कथित आहरण का जिक्र है। लेकिन उस आहरण से जुड़ी कोई पुष्ट पत्रावली मौजूद नहीं। यानि कागजों में पैसा निकला, लेकिन सबूत नहीं।
क्षेत्रीय प्रबंधक (मुख्य) महेश चन्द्र आर्य ने ईपीएफ ट्रस्ट के सचिव से पूरे प्रकरण की जांच कर वास्तविक स्थिति बताने को कहा है। जब तक पुराने रिकॉर्ड, कथित आहरण और वास्तविक देयता की सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक न भुगतान का फैसला होगा, न खाता खुलेगा।
कुल मिलाकर यह मामला सिर्फ 4.58 लाख या 67.29 लाख का नहीं है। यह सवाल है क्या सरकारी निगमों में वर्षों पुराने मामलों की कोई जवाबदेही है? बिना हस्ताक्षर की नोटशीट कैसे चलती रही? अगर 67 लाख रुपये वाकई निकले, तो जिम्मेदार कौन है? उत्तराखण्ड वन विकास निगम का यह प्रकरण बता रहा है कि फाइलें जब लापरवाही से चलती हैं, तो एक दिन बैंक खाते सीज होते हैं, और फिर पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा नजर आता है। सवाल अब भी बाकी हैं। जवाब किस फाइल में मिलेंगे इसकी जबाबदेही तय नहीं है।

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