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साढ़े छब्बीस साल में नहीं मिल पाया दमदार नेता, इस बार एसआईआर भर भरोसा रेनू अधिकारी, डा. जोगेंद्र रौतेला, प्रदीप बिष्ट, हुकुम सिंह कुंवर, अनिल डब्बू और शंकर कोरंगा की चर्चा

हल्द्वानी/ गणेश पाठक

साढ़े छब्बीस साल के जवान उत्तराखंड में कई नामी गिरामी नेता बुढ़ापे के साए में आ गए हैं। गौमुख से निकलने वाली पापनाशिनी गंगा समेत कई नदियों में न जाने कितना पानी आ गया होगा। इन पावन नदियों ने कितने पापियों का पाप धोया होगा, लेकिन अपनी हल्द्वानी में भाजपा का सूखापन बरकरार है। 2027 विधानसभा के महारण के लिए अब करीब छह माह का वक्त शेष है। अभी तक हल्द्वानी विधानसभा के लिए भाजपा एक अदद प्रत्याशी की खोज पूरी नहीं कर सकी है। हल्द्वानी उत्तराखंड की आर्थिक राजधानी है और इस विस का विधायक राज्य के सामाजिक, राजनीतिक समीकरणों में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। अभिभाजित यूपी में एनडी तिवारी और राज्य गठन के बाद डा. इंदिरा हृदयेश की वजह से यह सीट काफी महत्वपूर्ण रही है। एसआईआर की चर्चा के बीच जातीय समीकरण भाजपा के लिए अभी माकूल नहीं है। 2007 के विस चुनाव को छोड़कर अभी तक भाजपा इस सीट को अपने पाले में नहीं डाल पायी है। इसके लिए प्रचंड हिंदू कार्ड भी भाजपा का तारणहार नहीं बन सका है। माना जा रहा है कि यदि मुस्लिम समुदाय के दस हजार से ज्यादा वोट कट गए‌ तो हल्द्वानी विस का चुनावी रण काफी रोचक हो सकता है, लेकिन इसके लिए भाजपा को एक अहंकार रहित मिलसार दावेदार को चुनाव मैदान में उतारना है।
उत्तराखंड राज्य गठन के पहले विस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी इंदिरा हृदयेश और भाजपा प्रत्याशी बंशीधर भगत के बीच में कांटे का मुकाबला देखने को मिला था। तब इंदिरा को कुल 23 हजार 327 वोट मिले तो बंशीधर भगत ने 20 हजार 269 बोट लाकर सभी को चौंका दिया था। इस बार हल्द्वानी में हिंदू वोटर गोलबंद होते दिखने लगे थे। इसके बाद अगले विस चुनाव 2007 में भाजपा प्रत्याशी बंशीधर भगत ने डॉ इंदिरा हृदयेश के साथ हिसाब-किताब बराबर कर दिया। तब भाजपा प्रत्याशी बंशीधर भगत को 39 हजार 248 तो इंदिरा को 35 हजार 13 वोट मिल सके। उस समय सपा प्रत्याशी अब्दुल मतीन सिद्दीकी और कांग्रेस के बागी मोहन पाठक इंदिरा के हार के कारण बने। तब पहली दफा मुस्लिम वोटर गोलबंद नजर आए जबकि हिंदू वोटर आपस में उलझते देखने को मिले। इसके बाद अगले विस चुनाव 2012 में इंदिरा को 42 हजार 627 जबकि भाजपा प्रत्याशी रेनू अधिकारी को 19 हजार 44 वोट मिले। इस बार अब्दुल मतीन सिद्दीकी का ग्राफ कुछ कम हुआ। इंदिरा की रिकार्ड जीत के बाद भाजपा को गहरा झटका लगा और अगले विस चुनाव 2017 में भाजपा ने महापौर डा. जोगेंद्र सिंह रौतेला पर दांव खेला। इस बार भी डॉ इंदिरा हृदयेश ने 43 हजार 524 वोट हासिल किए और रौतेला ने बेहतर प्रदर्शन करने के बाद 37 हजार 299 वोट हासिल किए। तब सपा प्रत्याशी शोएब अहमद को 10 हजार 336 वोट ही मिल सके। एक तरह से करीब दस हजार मुस्लिम वोट पूरी तरह से इंदिरा के खाते में चले गए।
2022 विस चुनाव में जाने की तैयारी के बीच इंदिरा हृदयेश की आकस्मिक मृत्यु के बाद इंदिरा लहर के बीच उनके छोटे पुत्र सुमित हृदयेश को 50 हजार 116 वोट मिले तो भाजपा प्रत्याशी डा. जोगेंद्र रौतेला को 42 हजार 202 वोट पर ही संतुष्ट होना पड़ा। इस बार सपा प्रत्याशी मतीन सिद्दीकी को मात्र 908 वोट मिल सके। एक तरह से सारा मुस्लिम वोट सुमित के खाते में चला गया। यही सुमित के जीत का आधार बना। एक मजेदार बात यह भी देखने को मिली कि पूरे राज्य में 2022 में कांग्रेस के खिलाफ जनाक्रोश के बाद यह सीट भाजपा अपने पाले में नहीं ला सकी। अब बारी 2027 की है। इस बार सुमित हृदयेश के पक्ष में भी वातावरण नहीं दिख रहा है। एक तरह से विधायक विरोधी रुझान का कांग्रेस को नुकसान हो रहा है तो सत्ता विरोधी रुझान का कांग्रेस को लाभ मिलता दिख रहा है। अब भाजपा के सामने हल्द्वानी सीट पर कब्जा करने की चुनौती का अभी तक कोई हल नहीं निकल सका है। भाजपा इस बार पूर्व प्रत्याशी डॉ जोगेद्र पाल सिंह रौतेला या दायित्वधारी रेनू अधिकारी पर दांव खेल सकती है। इसके अलावा उत्तराखंड मंडी परिषद अध्यक्ष डा. अनिल डब्बू भी प्रत्याशी हो सकते हैं। टिकट मिलने पर डब्बू कभी विधायक का चुनाव न लड़ने की पीड़ा से मुक्त हो सकते हैं और हिंदूत्व के कार्ड में पहाड़ी मैदानी एक होकर नया इतिहास रच सकते हैं। यही स्थिति वरिष्ठ भाजपा नेता हुकुम सिंह कुंवर की भी है। कुंवर को टिकट मिलने पर मुकाबला रोचक हो सकता है। एक नाम भाजपा पूर्व जिलाध्यक्ष प्रदीप बिष्ट का है। बिष्ट जागेश्वर और हल्द्वानी दोनों स्थानों से टिकट मांग रहे हैं। बिष्ट अच्छा वक्ता होने के साथ चुनावी रण को रोचक बना सकते हैं। फिर एसआईआर का परिणाम भी भाजपा के पक्ष में जा सकता है। दायित्वधारी शंकर कोरंगा भी हल्द्वानी में फील्डिंग सजाना चाहते हैं। यही नही भाजपा की नजर कांग्रेस के भीतर बगावत के स्वरों पर ही टिकी हुई है। निकाय चुनाव में जीतते जीतते पराजय का मुंह देखने वाले ललित जोशी कांग्रेस के खिलाफ झंडा उठा सकते हैं। कांग्रेस में टिकट की दावेदारी में डा. दीपक बल्यूटिया का भी बड़ा नाम है। सुमित हृदयेश सीटिंग विधायक हैं। इनको लग रहा है कि इस बार कांग्रेस की सरकार आ रही है, लेकिन अपनी सीट बचाने के लिए कांग्रेस से छिटक गए नेताओं को जोड़ने का काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है।

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