
शांत राज्य की जेलों में शोर करती भीड़, नैनीताल से देहरादून तक क्षमता से डेढ़ से दोगुने बंदी
राजेश सरकार
देहरादून। उत्तराखंड को अक्सर शांत पहाड़ों, सुकून भरी वादियों और कम अपराध वाले राज्य के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन राज्य की जेलों के भीतर की तस्वीर इस शांति से मेल नहीं खाती। जेलों की सलाखों के पीछे एक अलग उत्तराखंड बसता है जहाँ क्षमता से कहीं अधिक कैदी बंद हैं, बैरकों में जगह कम पड़ रही है और सुधार गृह धीरे-धीरे भीड़ गृह बनते जा रहे हैं। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि राज्य में कुल कैदियों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में कम हुई है, लेकिन जेलों में भीड़ कम नहीं हुई। बल्कि कई जेलें अब भी अपनी स्वीकृत क्षमता से डेढ़ से दो गुना तक भरी हुई हैं। काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता अधिवक्ता नदीम उद्दीन द्वारा महानिरीक्षक कारागार, उत्तराखंड से मांगी गई सूचना में यह स्थिति सामने आई है। कारागार मुख्यालय ने 23 फरवरी 2026 को उपलब्ध कराए गए जवाब में राज्य की जेलों की क्षमता और वर्तमान बंदियों का विवरण दिया है। इससे पहले 07 फरवरी 2025 को भी इसी संबंध में सूचना उपलब्ध कराई गई थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में उत्तराखंड की जेलों में कुल 5521 कैदी बंद थे। फरवरी 2026 तक यह संख्या घटकर 4812 रह गई। यानी 765 कैदी कम हुए। लेकिन सवाल यह है कि जब संख्या कम हुई तो जेलों की भीड़ क्यों नहीं घटी? क्यों आज भी कई जेलों में कैदी फर्श पर सोने को मजबूर हैं? क्यों सुधार की जगह समायोजन व्यवस्था चल रही है? राज्य की सबसे अधिक भीड़ वाली जेल इस समय जिला कारागार नैनीताल है। यहाँ स्वीकृत क्षमता सिर्फ 71 कैदियों की है, लेकिन बंद हैं 141 कैदी। यानी लगभग दोगुने। एक छोटे पहाड़ी शहर की जेल में इतनी भीड़ सिर्फ आंकड़ा नहीं, व्यवस्था की थकान भी है।
दूसरे स्थान पर जिला कारागार अल्मोड़ा है। 102 क्षमता वाली इस जेल में 189 कैदी बंद हैं। जेल प्रशासन की भाषा में यह 185 प्रतिशत अधिभोग है। आम आदमी की भाषा में कहें तो दो लोगों की जगह में चार लोग रह रहे हैं।
राजधानी देहरादून की जिला कारागार में 580 क्षमता के मुकाबले 911 कैदी बंद हैं। यानी 157 प्रतिशत अधिभार।
पिछले साल यही संख्या 1122 थी। संख्या घटी है, लेकिन जेल अब भी अपनी सीमा से बहुत आगे चल रही है। राजधानी की जेल अगर इस हालत में है तो दूरदराज़ की जेलों का अंदाज़ लगाया जा सकता है। उपकारागार हल्द्वानी में 675 क्षमता के मुकाबले 1025 कैदी बंद हैं। केन्द्रीय कारागार सितारगंज में 552 क्षमता पर 772 कैदी। रुड़की उपकारागार में 244 की जगह 298 बंदी हैं। इन आंकड़ों में सिर्फ भीड़ नहीं दिखती, बल्कि जेल व्यवस्था पर लगातार बढ़ता दबाव भी दिखाई देता है सुरक्षा पर दबाव, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव और सबसे अधिक मानवीय गरिमा पर दबाव। सबसे कम बंदी सम्पूर्णानंद शिविर (खुली जेल) सितारगंज में हैं। 300 क्षमता वाली इस जेल में केवल 56 कैदी बंद हैं। यानी सिर्फ 19 प्रतिशत। यह वही मॉडल है जिसकी चर्चा अक्सर सुधारात्मक कारागार व्यवस्था के उदाहरण के रूप में होती है। खुली जेलों में कैदियों को अपेक्षाकृत खुला वातावरण मिलता है, श्रम और पुनर्वास के अवसर मिलते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब खुली जेलों में जगह है तो बंद जेलों में इतनी भीड़ क्यों? जिला कारागार चमोली में 169 क्षमता के मुकाबले 109 कैदी बंद हैं। पौड़ी जेल में 150 क्षमता के मुकाबले 108 कैदी। टिहरी जेल में क्षमता के बराबर 150 कैदी ही बंद हैं। यानी पूरे राज्य में कुछ ही जेलें ऐसी हैं जहाँ व्यवस्था अभी नियंत्रण में दिखाई देती है। जब जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होते हैं तो उसका असर सिर्फ सोने की जगह पर नहीं पड़ता। खाना, पानी, चिकित्सा, सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सब प्रभावित होते हैं। अदालतों में मुकदमे लंबित हों, जमानत में देरी हो, विचाराधीन कैदी वर्षों तक जेल में रहें तो जेलें धीरे-धीरे न्याय व्यवस्था की प्रतीक्षा कक्ष बन जाती हैं। भारत की अधिकांश जेलों की तरह उत्तराखंड की जेलों में भी बड़ी संख्या विचाराधीन कैदियों की होती है। यानी वे लोग जिन्हें अभी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया है। उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत शांत राज्य में जेलों की यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है क्या जेलों का विस्तार पर्याप्त नहीं हुआ? क्या न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीमी है? क्या छोटे अपराधों में भी लंबे समय तक बंदी बनाए रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है? या फिर जेल सुधार सिर्फ फाइलों में चल रहा है? सरकारी रिपोर्टें अक्सर सुधारात्मक व्यवस्था की बात करती हैं। लेकिन जब एक बैरक अपनी क्षमता से दोगुने लोगों को समेटने लगे तो सुधार सबसे पहले सांस लेने की जगह मांगता है। उत्तराखंड की जेलों के ये आंकड़े सिर्फ बंदियों की गिनती नहीं हैं। ये उस व्यवस्था का आईना हैं जिसमें कैदी कम हो सकते हैं, लेकिन भीड़ नहीं।
2025 में स्थिति और भी खराब थी
07 फरवरी 2025 को उपलब्ध सूचना बताती है कि स्थिति तब और गंभीर थी।
नैनीताल जेल में 71 क्षमता पर 143 कैदी बंद थे।
अल्मोड़ा जेल में 102 क्षमता पर 291 कैदी।
देहरादून जेल में 580 क्षमता पर 1122 कैदी।
हल्द्वानी जेल में 635 क्षमता पर 1188 कैदी।
हरिद्वार जेल में 888 क्षमता पर 1120 कैदी।
यानी जेलें उस समय अपने आकार से कहीं अधिक लोगों को ढो रही थीं।
