
शिकायतों, आरटीआई और अदालत की चौखट तक पहुँची आवाज़ तब जाकर शुरू हुआ इलाज
हल्द्वानी: कभी-कभी खबरें सिर्फ खबर नहीं होतीं, वे सवाल बन जाती हैं। यह कहानी भी एक सवाल है क्या इस देश में इलाज पाने के लिए बीमार होना काफी नहीं, या फिर आवाज़ उठाने वाला कोई होना जरूरी है? नैनीताल जिले के रामगढ़ में रहने वाले हेम चन्द्र पांडे पिछले तीन साल से बिस्तर पर थे। पैरालिसिस और एक दुर्घटना के बाद उनका शरीर जवाब दे चुका था। लेकिन सच यह है कि उनका शरीर जितना टूटा था, उससे ज्यादा टूटी हुई थी व्यवस्था जो उन्हें देख नहीं रही थी। घर में आय का एकमात्र सहारा पत्नी की छह हजार रुपये की नौकरी। इतने में इलाज नहीं होता, बस जिंदगी खिंचती है। यहीं से इस कहानी में एक और किरदार आता है समाजसेवी हेमंत सिंह गोनिया। उन्होंने सिर्फ देखा नहीं, उन्होंने सवाल किया।
उन्होंने सिर्फ पूछा नहीं, उन्होंने लिखा। उन्होंने सिर्फ लिखा नहीं, उन्होंने पीछा किया। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक शिकायतें भेजी गईं। सीएम हेल्पलाइन पर मामला दर्ज हुआ। फाइलें चलीं, नोटिंग हुई, लेकिन जैसा अक्सर होता है गति धीमी थी। फिर एक और कदम उठा न्यायालय की ओर। जनहित प्रार्थना पत्र मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया। अदालत ने संज्ञान लिया। स्वास्थ्य विभाग से जवाब मांगा गया। और यहीं से सिस्टम की नींद खुली। अचानक सब कुछ तेज हो गया। निर्देश जारी हुए। अस्पताल को कहा गया इलाज कीजिए।
108 एम्बुलेंस पहुँची मरीज को लाने के लिए। हल्द्वानी के डॉ सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज में हेम चन्द्र पांडे का इलाज अब वीआईपी स्तर पर हो रहा है। यह शब्द सुनने में भले ही अच्छा लगे, लेकिन एक सवाल छोड़ जाता है क्या आम आदमी को इलाज पाने के लिए वीआईपी बनना पड़ेगा? इस बीच जनप्रतिनिधियों की भी एंट्री हुई। एम्स में भर्ती की सिफारिश के लिए पत्र लिखा गया। यानी अब मामला सिर्फ एक मरीज का नहीं रहा यह एक केस बन गया। डॉक्टरों की टीम जांच कर रही है। कहा जा रहा है अगर यहाँ इलाज संभव हुआ तो यहीं होगा, नहीं तो बड़े संस्थान में रेफर किया जाएगा। लेकिन इस पूरी कहानी में एक और सच्चाई है परिवार की चुप्पी। बताया जाता है कि अपने भाई और माता तक ने साथ नहीं दिया। ऐसे में एक समाजसेवी ही परिवार बन गया। सोशल मीडिया पर अपील की गई। लोगों ने पैसे भेजे। करीब चालीस हजार रुपये इकट्ठा हुए। छोटी रकम लग सकती है, लेकिन यह भरोसे की बड़ी पूंजी है। आरटीआई डाली गईं। जवाब मांगे गए। फाइलों को जवाब देना पड़ा। और जवाबदेही तय हुई। यह कहानी बताती है कि सिस्टम खुद से नहीं चलता, उसे चलाना पड़ता है। धक्का देना पड़ता है। कभी कागज़ से, कभी अदालत से, और कभी इंसानियत से। आज हेम चन्द्र पांडे का इलाज जारी है। एक परिवार को उम्मीद मिली है और समाज को एक संदेश अगर कोई लगातार खड़ा रहे, तो व्यवस्था को भी खड़ा होना पड़ता है। लेकिन आखिरी सवाल अभी भी बाकी है क्या हर हेम चन्द्र पांडे को एक हेमंत गोनिया मिलेगा?
