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जब कोई नहीं आता, तब ये लोग आते हैं हल्द्वानी में इंसानियत की चुपचाप जलती हुई लौ

देव सरकार

हल्द्वानी से एक ऐसी खबर आई है, जो शोर नहीं करती, लेकिन समाज के भीतर कहीं गहराई तक उतर जाती है। दो दिन। दो लावारिस शव। और हर बार, कुछ लोग जो रिश्तेदार नहीं थे, लेकिन फिर भी सबसे ज़्यादा अपने निकले। 28 मार्च करीब 70 साल के एक अज्ञात बुजुर्ग का अंतिम संस्कार किया गया। 29 मार्च एक और शव, जिसका कोई दावा करने वाला नहीं था, उसे भी पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ विदा किया गया। ये काम प्रशासन की मजबूरी में नहीं, बल्कि समाजसेवियों की इच्छा से हुआ।
हेमंत गौनिया, वंश गौनिया, नवीन कपिल और अमित रस्तोगी ये नाम किसी बड़े मंच पर नहीं गूंजते, लेकिन श्मशान घाट की खामोशी में इनकी मौजूदगी बहुत कुछ कह जाती है। इन लोगों ने सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं किया। लकड़ी से लेकर सामग्री तक, एंबुलेंस से लेकर बाकी खर्च तक सब कुछ अपनी जेब से किया। ये कोई एनजीओ नहीं। कोई सरकारी फंड नहीं। बस एक चीज सेवा की जिद।
पिछले दो वर्षों में ये टीम 234 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी है। और 234 सिर्फ एक संख्या नहीं है ये 234 कहानियाँ हैं, जिन्हें बिना नाम के विदा किया गया, लेकिन बिना सम्मान के नहीं।
हम अक्सर पूछते हैं समाज कहाँ जा रहा है? लेकिन शायद सवाल यह भी होना चाहिए समाज को बचाए कौन हुए हैं? हल्द्वानी पुलिस चौकी भोटिया पड़ाव ने इन समाजसेवियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। यह सम्मान सिर्फ कागज़ नहीं है, बल्कि उस भरोसे की मुहर है कि इंसानियत अभी खत्म नहीं हुई है। क्योंकि जब किसी का कोई नहीं होता तब भी कोई होता है। और वही लोग, इस समाज की असली खबर हैं।

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