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राजाजी टाइगर रिजर्व में शादी नहीं, व्यवस्था की परीक्षा हुई

देहरादून: हरिद्वार के राजाजी टाइगर रिजर्व से जो कहानी बाहर आई है, वह केवल एक शादी की अनुमति या उसके उल्लंघन की नहीं है। यह उस प्रशासनिक ढांचे की कहानी है, जो कागज़ पर जितना सख्त दिखता है, ज़मीन पर उतना ही लचीला, दबाव-संवेदनशील और अवसरानुकूल दिखाई देता है। मां सुरेश्वरी देवी मंदिर, जो टाइगर रिजर्व के संवेदनशील क्षेत्र में आता है, वहां एक कैबिनेट मंत्री के बेटे की शादी का आयोजन तय हुआ। यह कोई साधारण जगह नहीं है। यह वही क्षेत्र है जहां वन्यजीव संरक्षण कानून, एनटीसीए के दिशा-निर्देश, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और एनजीटी के आदेश सब मिलकर एक सख्त ढांचा बनाते हैं, जहां शोर, भीड़ और व्यावसायिक गतिविधियां सैद्धांतिक रूप से प्रतिबंधित रहती हैं। लेकिन तस्वीरें कुछ और कहती हैं।
ट्रकों से टेंट, कुर्सियां, कूलर, सजावट सब कुछ मंदिर परिसर तक पहुंचता है। एक संरक्षित क्षेत्र कुछ घंटों के लिए आयोजन स्थल में बदल जाता है। और फिर अचानक, जब विवाद उठता है, वही सामान उतनी ही तेजी से हटा भी दिया जाता है। मानो नियम नहीं, परिस्थिति तय कर रही हो कि क्या वैध है और क्या नहीं। यहीं से सवाल शुरू होते हैं।
वन विभाग की कार्रवाई में दो फॉरेस्ट गार्ड सस्पेंड कर दिए जाते हैं, एक रेंजर और एक वन दरोगा को हटा दिया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पूरी कहानी का अंतिम सच है या केवल सबसे निचले स्तर पर गिरती हुई जवाबदेही की एक परंपरागत तस्वीर?
क्योंकि जिस तरह का आयोजन हुआ, वह किसी गेट पर तैनात गार्ड की अनुमति से संभव नहीं लगता। यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें सूचना, सहमति और मौन स्वीकृति की कई परतें शामिल हो सकती हैं।
वन विभाग की कार्रवाई देखने में तेज़ लगती है लेकिन उसका पैटर्न पुराना है। जब भी किसी बड़े आयोजन या प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा मामला सामने आता है, जांच का भार अक्सर फील्ड स्टाफ तक सीमित रह जाता है।
रेंजर स्तर पर बदलाव कर दिया जाता है, गार्ड सस्पेंड हो जाते हैं, लेकिन वह अनुमति कैसे बनी, किस स्तर पर संवाद हुआ, और किसने आंखें मूंदी ये सवाल जांच की परिधि में धीरे-धीरे धुंधले हो जाते हैं।
मंत्री पक्ष की ओर से यह कहा गया कि वन निदेशक से अनुमति मिली थी। अगर यह दावा पूरी तरह सही है, तो फिर स्थानीय स्तर पर कार्रवाई क्यों हो रही है? और अगर अनुमति स्पष्ट रूप से नहीं दी गई थी, तो इतने बड़े आयोजन की तैयारी बिना रोक-टोक कैसे आगे बढ़ गई?
यहीं पर प्रशासनिक संरचना एक उलझी हुई तस्वीर पेश करती है जहां या तो संचार टूटता है या जिम्मेदारी साझा होने के बजाय विभाजित होकर कमजोर हो जाती है।
राजाजी टाइगर रिजर्व जैसे क्षेत्रों में हर गतिविधि रिकॉर्ड और अनुमति के दायरे में होनी चाहिए। लेकिन व्यवहार में अक्सर अपवाद धीरे-धीरे परंपरा बनने लगते हैं और फिर वही अपवाद व्यवस्था की कमजोरी बन जाता है।
यह मामला भी इसी धुंधले क्षेत्र में खड़ा दिखाई देता है जहां नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका लागू होना परिस्थिति और प्रभाव पर निर्भर करता दिखता है।
यह पूरा विवाद केवल एक आयोजन का नहीं है। यह उस प्रशासनिक संस्कृति का आईना है जिसमें नियम सबसे पहले छोटे कर्मचारियों पर लागू होते हैं, जवाबदेही नीचे जाकर रुक जाती है और निर्णय लेने की परतें अक्सर अदृश्य रहती हैं।
वन विभाग की कार्रवाई को व्यवस्था की सख्ती के रूप में भी देखा जा सकता है, लेकिन उतना ही जरूरी यह सवाल भी है कि क्या यह सख्ती पूरी प्रणाली पर समान रूप से लागू होती है या केवल उस हिस्से पर जहां विरोध अपेक्षाकृत कम होता है। फिलहाल जांच जारी है। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि संरक्षित जंगलों के भीतर सबसे बड़ा संघर्ष जानवरों और इंसानों के बीच नहीं, बल्कि नियमों और प्रभाव के बीच चल रहा है।

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