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राजेश सरकार
हल्द्वानी: देहरादून से एक खबर आई है। छोटी-सी लग सकती है, लेकिन अगर ठहरकर देखें तो यह सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि वर्षों की निष्ठा, धैर्य और संघर्ष की कहानी भी है। उत्तराखण्ड शासन ने नैनीताल के निवासी ध्रुव रौतेला को मीडिया सलाहकार समिति में उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। आदेश 3 अप्रैल 2026 को जारी हुआ। सरकारी भाषा में यह एक प्रशासनिक निर्णय है सुविधाएं मिलेंगी, खर्च विभाग उठाएगा, और आगे उनके अधिकार व दायित्व अलग से तय होंगे। लेकिन हर सरकारी आदेश के पीछे एक मानवीय कहानी भी होती है। यह उसी कहानी को समझने की कोशिश है। ध्रुव रौतेला एक ऐसा नाम जो शायद अभी बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन एक लंबे राजनीतिक और व्यक्तिगत सफर का गवाह जरूर है। नैनीताल जिले के भीमताल क्षेत्र के एक साधारण परिवेश से निकलकर उन्होंने अपनी पहचान बनाई। यह पहचान रातों-रात नहीं बनी। करीब बीस साल पहले उन्होंने एक रास्ता चुना भगत सिंह कोश्यारी के साथ खड़े रहने का रास्ता। यह रास्ता आसान नहीं था। राजनीति में वफादारी अक्सर चर्चा में तो रहती है, लेकिन टिकती कम है। ध्रुव ने इसे निभाया।
उन्होंने पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा था अखबारों और टीवी चैनलों से जुड़े। लेकिन एक समय ऐसा आया जब उन्होंने अपने पेशे को पीछे छोड़ दिया और मीडिया प्रबंधन के लिए पूरी तरह समर्पित हो गए। यह एक जोखिम था। करियर दांव पर था, भविष्य अनिश्चित था। लेकिन उन्होंने साथ नहीं छोड़ा।
राजनीति के उतार-चढ़ाव, सत्ता और विपक्ष के बदलते समीकरण, सार्वजनिक जीवन की चुनौतियां हर दौर में वे अपने नेता भगत सिंह कोश्यारी के साथ खड़े रहे। कई लोग आते हैं, कई चले जाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो परछाई की तरह साथ बने रहते हैं।
ध्रुव उन्हीं में से एक रहे। व्यक्तिगत जीवन भी आसान नहीं रहा। जन्म से पहले ही पिता का साया उठ गया। मां के संघर्षों के सहारे उन्होंने जीवन की दिशा तय की। शायद इसी ने उन्हें रिश्तों की कीमत समझाई। शायद यही वजह है कि वे अपने मार्गदर्शक को बाबूजी कहकर संबोधित करते रहे। यह कहानी सिर्फ राजनीति की नहीं है, यह भरोसे की भी है। सरकार ने अब उन्हें एक नई जिम्मेदारी दी है मीडिया सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष के रूप में। यह पद सिर्फ पद नहीं होता। यह सरकार और जनता के बीच संवाद का एक पुल होता है। सूचना, पारदर्शिता और जवाबदेही इन तीनों की कसौटी पर ऐसे पदों को परखा जाता है।
सरकार का कहना है कि यह कदम मीडिया और जनसंपर्क में दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए है। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे पदों पर बैठे लोगों की व्यक्तिगत कार्यशैली ही तय करती है कि व्यवस्था कितनी संवेदनशील और जवाबदेह बनेगी। अब देखना यह होगा कि ध्रुव रौतेला इस भूमिका को कैसे निभाते हैं। क्या वे सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति बनकर रह जाएंगे? या फिर वे संवाद को सरल, पारदर्शी और जनता के करीब लाने की दिशा में कुछ नया करेंगे? यह सवाल अभी खुला है। लेकिन फिलहाल, यह कहना गलत नहीं होगा कि यह नियुक्ति एक लंबी प्रतीक्षा का परिणाम है एक ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसने अवसर से पहले निष्ठा को चुना। और शायद, आज की राजनीति में यह अपने आप में एक खबर है।

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