
करोड़ों रुपए में तैयार प्रकाष्ठ सड़ रहा है, वन निगम का प्रबंधन सोया हुआ
देहरादून। उत्तरकाशी जिले के पुरोला में स्थित टौंस लॉगिंग प्रभाग का वन विकास निगम द्वारा तैयार किया गया स्लीपर (प्रकाष्ठ) तीन वर्षों से जगह-जगह पड़ा हुआ है। यह स्लीपर, जिसे चिरान-कटान और ढुलाई आदि प्रक्रियाओं से तैयार किया गया, अब सड़-गल रहा है। हकीकत यह है कि जिन पेड़ों से यह उत्पादित किया गया, उनकी कीमत करोड़ों रुपए में वन विभाग को लायल्टी के रूप में अदा की गई थी, और वन विकास निगम ने इस स्लीपर को तैयार करने में करोड़ों रुपए खर्च कर दिए। लेकिन तीन वर्षों से वन विभाग की ओर से इस स्लीपर की निकासी नहीं की गई, जिससे इसकी गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि निगम करोड़ों रुपए का लाभ कमाने की बजाय बड़े नुकसान की ओर बढ़ रहा है।
वन विकास निगम के कर्मचारी संघ ने उत्तराखंड वन विकास निगम के प्रबंध निदेशक को तीन बार लिखित रूप से सूचना दी कि टौंस लॉगिंग प्रभाग के प्रकाष्ठ की निकासी के लिए संबंधित अधिकारियों से आवश्यक कार्रवाई की जाए। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। कर्मचारी संघ का आरोप है कि प्रबंधन सिर्फ निजी हित, आराम और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में व्यस्त है। अधिकारियों की चुप्पी देखा जाएगा, हमारा क्या जा रहा, हम आज यहां तो कल वहां जैसी उदासीन मानसिकता ने करोड़ों रुपए की हानि को आमंत्रित किया है।
स्लीपर की गुणवत्ता में गिरावट स्पष्ट रूप से निगम के खर्च और प्रयास पर संकट डाल रही है। वन विकास निगम ने वर्षों में पेड़ों की कटाई, चिरान, ढुलाई और उत्पादित प्रकाष्ठ के रख-रखाव में करोड़ों रुपए खर्च किए, लेकिन विभागीय उदासीनता और प्रबंधन की निष्क्रियता के कारण यह संपत्ति अब मूल्यहीन हो रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय पर निकासी और सही भंडारण न किया गया, तो करोड़ों रुपए का नुकसान निश्चित है। कर्मचारी संघ ने चेतावनी दी है कि यह सिर्फ वन निगम का मामला नहीं, बल्कि जनसंपदा के संरक्षण और सरकारी धन के कुशल प्रबंधन का मामला है।
यह मामला सिर्फ स्लीपर का नहीं है। यह उस सोच का प्रतीक है जो सरकारी संस्थानों में आम है जहां जिम्मेदारी और कर्तव्य भूलकर निजी आराम और भ्रष्टाचार को प्राथमिकता दी जाती है। तीन वर्षों से पड़ा स्लीपर और उसमें आने वाला करोड़ों का नुकसान सरकार और वन विभाग की जिम्मेदारीहीनता का जीता-जागता उदाहरण है।
इस संकट के बीच यह सवाल उठ रहे है कि वन विकास निगम का प्रबंधन कहां सोया हुआ है? प्रबंधन का अधिकार और जिम्मेदारी क्या है? करोड़ों रुपए के नुकसान के लिए कौन जवाबदेह होगा? इस मामले में न तो वन विभाग सक्रिय हुआ है और न ही निगम का प्रबंधन। और इसी उदासीनता की कीमत भुगत रहे हैं सरकारी धन और प्रकृति दोनों।
