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चंदन की खुशबू और व्यवस्था की खामोशी: उत्तराखंड के जंगलों में एक अधूरी संभावना की कहानी

राजेश सरकार
देहरादून: उत्तराखंड में चंदन की खेती की चर्चा अब प्रयोगशालाओं और सीमित खेतों से निकलकर संभावनाओं के बड़े नक्शे पर दिखाई देने लगी है। शोध कहता है यह संभव है। किसान कहते हैं यह लाभकारी है। सरकार कहती है नियम आसान कर दिए गए हैं। लेकिन जंगल, जंगल अब भी चुप हैं। यह वही राज्य है, जहां लगभग 71 प्रतिशत भू-भाग जंगलों से ढका है। अगर इस भू-भाग में चंदन के पेड़ खड़े होते, तो शायद यह सिर्फ हरियाली की कहानी नहीं होती, बल्कि राजस्व की भी एक नई इबारत लिखी जा सकती थी। सवाल यह है कि जब संभावना इतनी स्पष्ट है, तो चंदन अब भी जंगलों का हिस्सा क्यों नहीं बन पाया?
एक तरफ विश्वविद्यालयों के सफल प्रयोग हैं, तराई में विकसित मॉडल हैं, और किसानों के बीच बढ़ती रुचि है। दूसरी तरफ एक हकीकत है वन विभाग की सीमाएं। जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, वे खुद कितने सुरक्षित हैं? वन विभाग के पास अत्याधुनिक हथियारों की कमी है। तस्करी करने वाले गिरोह संगठित हैं, संसाधनों से लैस हैं, और कई बार संख्या में भी भारी होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है क्या वन रक्षक वास्तव में रक्षक की भूमिका निभाने के लिए तैयार किए गए हैं?
वन गार्ड, वन दरोगा और अन्य कर्मचारी इनकी ट्रेनिंग पुलिस या सेना जैसी नहीं होती। जंगल में मुकाबला सिर्फ पेड़ों की देखभाल का नहीं है, बल्कि अवैध कटान और तस्करी से टकराने का भी है। जब प्रशिक्षण और संसाधन सीमित हों, तो जोखिम बढ़ता है और शायद यही वजह है कि चंदन जैसे कीमती पेड़ को बड़े पैमाने पर जंगलों में शामिल करने से परहेज किया गया।
चंदन सिर्फ एक पेड़ नहीं है, यह एक चलती-फिरती पूंजी है। 12 से 15 साल में तैयार होने वाला एक पेड़ लाखों रुपये का हो सकता है। लेकिन यही मूल्य उसे तस्करों के निशाने पर भी लाता है।
तो क्या हम यह मान लें कि चंदन की खेती इसलिए सीमित है क्योंकि हम उसकी सुरक्षा नहीं कर सकते? या यह मानें कि व्यवस्था ने जोखिम से बचने का रास्ता चुन लिया है?
सरकार ने किसानों को निजी जमीन पर चंदन लगाने की छूट दी है। पंजीकरण की व्यवस्था है, ट्रांजिट पास की प्रक्रिया है। लेकिन जंगल जहां सबसे ज्यादा जगह है वह इस योजना से बाहर क्यों हैं?
अगर 71 प्रतिशत जंगलों वाले राज्य में चंदन का नियंत्रित और सुरक्षित प्लांटेशन होता, तो क्या उत्तराखंड देश के सबसे समृद्ध राज्यों में शामिल नहीं हो सकता था? यह सिर्फ एक कल्पना नहीं, एक संभावित आर्थिक मॉडल है।
यहां सवाल यह है कि क्या वन विभाग को मजबूत करने की जरूरत है? क्या आधुनिक हथियार और बेहतर ट्रेनिंग इस तस्वीर को बदल सकते हैं? क्या चंदन की खेती को जंगलों तक ले जाने के लिए एक नई नीति की जरूरत है?
ये सवाल सिर्फ कागज पर नहीं हैं। ये सवाल उन जंगलों में गूंजते हैं, जहां अभी चंदन की खुशबू पहुंचनी बाकी है। कुल मिलाकर उत्तराखंड में चंदन की कहानी अधूरी नहीं है, लेकिन पूरी भी नहीं है। यह एक ऐसी संभावना है, जो व्यवस्था की तैयारी का इंतजार कर रही है। जब तक जंगल सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक चंदन सिर्फ खेतों की मेड़ों तक सीमित रहेगा। और तब तक यह सवाल भी बना रहेगा क्या हमने एक बड़े अवसर को सिर्फ इसलिए रोक दिया, क्योंकि हम उसकी रक्षा के लिए तैयार नहीं थे?

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चंदन की खेती और इसके गुणों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा: रंजन मिश्र

मैं बॉटनी का छात्र हूं, इसलिए यह सवाल मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है कि क्या वास्तव में उत्तराखंड में चंदन के पेड़ नहीं उग सकते यह धारणा कितनी सही है। प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) रंजन मिश्र का कहना है कि चंदन एक मूल्यवान प्रजाति है और इसकी खेती को लेकर संभावनाएं तलाशने की आवश्यकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि त्रिपुरा में चंदन को वन विभाग के नियंत्रण से बाहर कर दिया गया है, जिससे किसानों को इसकी खेती की पूरी आजादी मिली है।
उन्होंने यह भी कहा कि उत्तराखंड में चंदन की खेती और इसके गुणों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा। उनका मानना है कि यदि सही तरीके से अध्ययन और प्रयास किए जाएं, तो इसके सकारात्मक परिणाम अवश्य देखने को मिल सकते हैं।

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