
चार साल बाद देवभूमि में राहुल, चुनावी शंखनाद या संगठन की परीक्षा?
राजेश सरकार
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में अगले विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। इसी आहट के बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी करीब चार साल बाद उत्तराखंड पहुंच रहे हैं। राजनीति में दौरे केवल दौरे नहीं होते। वे संदेश होते हैं, संकेत होते हैं और कई बार पार्टी के भविष्य की दिशा भी तय करते हैं। राहुल गांधी का यह दौरा भी ऐसे ही सवालों के घेरे में है।
कांग्रेस इसे आगामी विधानसभा चुनाव के अभियान का शंखनाद मान रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल शंखनाद से युद्ध जीता जा सकता है? क्या कांग्रेस उन कमियों को दूर कर पाई है जो उसे लगातार चुनावी हार की ओर धकेलती रही हैं?
उत्तराखंड में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसके नेता नहीं, उसका बूथ स्तर का संगठन माना जाता है। चुनाव परिणामों का विश्लेषण बार-बार यह दिखाता है कि भाजपा का पन्ना प्रमुख मॉडल और बूथ प्रबंधन उसकी चुनावी मशीनरी की रीढ़ है। दूसरी तरफ कांग्रेस का संकट यह रहा है कि चुनाव आते-आते बयान बढ़ जाते हैं लेकिन बूथों पर कार्यकर्ता कम पड़ जाते हैं। प्रदेश में कांग्रेस के कई नेता सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखाई देते हैं, लेकिन गांवों और मतदान केंद्रों तक संगठन की पकड़ कमजोर पड़ जाती है। ऐसे में राहुल गांधी का पहला संदेश संगठन को लेकर हो सकता है। सूत्र बताते हैं कि वे साफ कर सकते हैं कि अब पहचान भाषणों और पोस्टरों से नहीं, बल्कि बूथ पर काम करने से बनेगी। जो नेता बूथ को मजबूत करेगा, वही संगठन में महत्व पाएगा। क्योंकि चुनाव टीवी स्टूडियो में नहीं, मतदान केंद्रों पर जीते जाते हैं। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति का एक पुराना अध्याय है, जो हर चुनाव से पहले खुल जाता है। यह अध्याय है आपसी खींचतान का। पार्टी के बड़े नेताओं के अलग-अलग खेमे हैं। कार्यकर्ता भी अक्सर नेताओं के साथ बंट जाते हैं। चुनाव के समय एकजुटता की बातें होती हैं, लेकिन नतीजों के बाद हार का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है। राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती शायद भाजपा नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर मौजूद यह गुटीय राजनीति हो सकती है। संभावना है कि वे नेताओं को यह संदेश दें कि सत्ता की वापसी का रास्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से नहीं, सामूहिक नेतृत्व से होकर गुजरता है। यह भी माना जा रहा है कि वे टिकट वितरण में आंतरिक और गोपनीय सर्वे को आधार बनाने की बात दोहरा सकते हैं, ताकि दावेदारी की लड़ाई को नियंत्रित किया जा सके।
राज्य में कई ऐसे मुद्दे हैं जो समय-समय पर जनभावनाओं को प्रभावित करते रहे हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर न्याय की मांग, भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक के मामले, बेरोजगारी का संकट और सैन्य बाहुल्य प्रदेश होने के कारण अग्निवीर योजना को लेकर उठी चिंताएं आज भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये मुद्दे केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और बड़े मंचों तक सीमित रह जाएंगे? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी कार्यकर्ताओं को यह जिम्मेदारी सौंप सकते हैं कि वे इन मुद्दों को हर गांव, हर कस्बे और हर बस्ती तक लेकर जाएं। क्योंकि किसी भी मुद्दे की राजनीतिक ताकत तभी बनती है जब वह जनता की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन जाए। कांग्रेस लगातार दो विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव हार चुकी है। चुनावी हार केवल सीटों का नुकसान नहीं करती, वह जनता के मन में पार्टी की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती है। आज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जनता उसे सत्ता के विकल्प के रूप में देखती भी है या नहीं। राहुल गांधी का एक महत्वपूर्ण संदेश जनता का भरोसा जीतने को लेकर हो सकता है। पार्टी नेताओं को यह कहा जा सकता है कि राजनीति केवल चुनाव के समय जनता तक पहुंचने का नाम नहीं है। जनता के सुख-दुख में शामिल हुए बिना राजनीतिक विश्वास नहीं बनता।
जनता को यह महसूस होना चाहिए कि विपक्ष केवल विरोध नहीं कर रहा, बल्कि उसके साथ खड़ा भी है। राहुल गांधी का दौरा निश्चित रूप से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करेगा। भाषण होंगे, नारे लगेंगे और राजनीतिक संदेश भी जाएंगे। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति का असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। क्या कांग्रेस अपने संगठन को बूथ तक खड़ा कर पाएगी? क्या उसके नेता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठ पाएंगे? क्या जनता के मुद्दों को चुनावी नारों से आगे ले जाया जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या कांग्रेस जनता का खोया हुआ भरोसा वापस हासिल कर पाएगी? राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा इन सवालों के जवाब नहीं देगा, लेकिन इतना जरूर तय करेगा कि कांग्रेस इन सवालों का सामना करने के लिए कितनी तैयार है। क्योंकि चुनाव केवल विपक्ष की नाराजगी से नहीं जीते जाते, बल्कि जनता के भरोसे से जीते जाते हैं।
