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90 दिन का कानून, 5 साल का इंतजार: 67 मामलों में सिर्फ 20 उपभोक्ताओं को मिली राहत

काशीपुर। अगर आप यह सोचकर जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाते हैं कि यहां आपको जल्दी न्याय मिलेगा, तो उधमसिंह नगर जिला उपभोक्ता आयोग के ताजा आंकड़े आपकी उम्मीदों पर सवाल खड़े करते हैं। कानून कहता है कि सामान्य मामलों का निस्तारण 90 दिनों में और प्रयोगशाला परीक्षण वाले मामलों का 150 दिनों में हो जाना चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि आयोग में कई मामले वर्षों से लंबित हैं और पांच साल पुराने केस भी अब तक फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
यह खुलासा सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन को उपलब्ध कराई गई जानकारी से हुआ है। आयोग के लोक सूचना अधिकारी एवं वरिष्ठ सदस्य नवीन चंद्र चंदौला द्वारा उपलब्ध कराए गए अभिलेख बताते हैं कि मई 2026 तक आयोग में 301 मामले लंबित थे। इनमें केवल 22 मामले ही 90 दिनों से कम अवधि के हैं, जबकि 124 मामले दो वर्ष से अधिक समय से लंबित पड़े हैं। इसके अलावा 78 मामले एक वर्ष से अधिक और 38 मामले छह माह से अधिक समय से लंबित हैं।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 38 के तहत सामान्य मामलों का निपटारा 90 दिनों में और जांच वाले मामलों का 150 दिनों में किए जाने का प्रावधान है। साथ ही अनावश्यक तारीख देने पर भी रोक लगाई गई है। अपवाद स्वरूप ही स्थगन देने की अनुमति है और उसके लिए कारण दर्ज करने तथा हर्जाना लगाने का भी प्रावधान है। इसके बावजूद आयोग में मामलों के निस्तारण की रफ्तार बेहद धीमी दिखाई देती है।
जनवरी से मार्च 2026 की त्रैमासिक रिपोर्ट के अनुसार आयोग में पांच वर्ष से अधिक समय से लंबित आठ मामले हैं। इनमें एक मामला वर्ष 2020 का और सात मामले वर्ष 2021 में दर्ज किए गए थे। आयोग ने इन मामलों में देरी का कारण पक्षकारों द्वारा बार-बार स्थगन (तारीख) लिया जाना बताया है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जनवरी से मई 2026 के बीच आयोग ने कुल 67 मामलों का निस्तारण किया, लेकिन इनमें केवल 20 मामलों में ही उपभोक्ताओं के पक्ष में फैसला आया। शेष मामलों में या तो परिवाद खारिज कर दिए गए, वापस ले लिए गए या फिर अन्य तकनीकी आधारों पर निस्तारित कर दिए गए।
माहवार आंकड़ों पर नजर डालें तो जनवरी में 10 मामलों का निपटारा हुआ, जिनमें केवल तीन मामलों में उपभोक्ताओं को राहत मिली। फरवरी में 16 मामलों में सिर्फ तीन, मार्च में 11 में पांच, अप्रैल में 14 में चार और मई में 16 मामलों में केवल पांच मामलों में ही परिवादियों के पक्ष में निर्णय आया।
आरटीआई से मिले दस्तावेज यह भी बताते हैं कि जिन मामलों को आयोग ने निर्धारित समय सीमा के भीतर निस्तारित होने की रिपोर्ट राज्य आयोग को भेजी, उनमें कई मामलों का फैसला गुण-दोष के आधार पर नहीं हुआ। कई परिवाद कुछ ही दिनों में वापस ले लिए गए, कुछ पैरवी न होने के कारण खारिज हो गए और कुछ तकनीकी आधार पर समाप्त कर दिए गए। ऐसे मामलों को भी समयबद्ध निस्तारण की श्रेणी में शामिल कर लिया गया।

उदाहरण के तौर पर जनवरी में जिन पांच मामलों को समय सीमा के भीतर निपटाया गया बताया गया, उनमें दो मामले वापस ले लिए गए और दो सीधे निरस्त कर दिए गए। फरवरी, मार्च, अप्रैल और मई में भी इसी तरह के मामले समयबद्ध निस्तारण की सूची में शामिल किए गए।
आयोग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2001 से 31 मार्च 2026 तक कुल 4,089 उपभोक्ता वाद दर्ज हुए। इनमें सबसे अधिक 1,360 मामले बीमा (इंश्योरेंस) से जुड़े हैं। इसके बाद 238 बैंकिंग, 212 बिजली, 172 चिकित्सा, 160 टेलीफोन, 152 हाउसिंग, पांच एयरलाइंस तथा 1,763 अन्य श्रेणियों के मामले दर्ज किए गए।
इन आंकड़ों ने उपभोक्ता न्याय व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जब कानून समयबद्ध न्याय की गारंटी देता है तो
फिर वर्षों तक मामले लंबित क्यों हैं? यदि निस्तारित मामलों में भी अधिकांश उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल रही और तकनीकी आधार पर मामलों को बंद किया जा रहा है, तो क्या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का मूल उद्देश्य पूरा हो पा रहा है?
सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन का कहना है कि यदि अधिनियम के प्रावधानों का गंभीरता से पालन किया जाए, अनावश्यक स्थगन पर रोक लगे और मामलों की नियमित सुनवाई हो, तो उपभोक्ताओं को समय पर न्याय मिल सकता है। उनका कहना है कि उपभोक्ता आयोगों की प्रभावशीलता तभी साबित होगी, जब आम उपभोक्ता को कम समय में वास्तविक और प्रभावी न्याय मिल सके।

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