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राजेश सरकार

देहरादून से उठी आवाज़ अब सिर्फ़ एक शहर की नहीं रही। यह आवाज़ उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर चल रही उस खामोश हलचल की है, जो अब शब्दों के ज़रिये सतह पर आने लगी है। पहले उपवास आया, फिर बयान आए, और अब संकेतों की राजनीति शुरू हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत 15 दिन के रणनीतिक उपवास पर हैं। राजनीति में उपवास कोई नई विधा नहीं है, लेकिन हर उपवास अपने साथ एक सवाल लेकर आता है यह आत्ममंथन है या दबाव की राजनीति? इसी बीच कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी का सोशल मीडिया पोस्ट सामने आता है। पोस्ट में सीधे किसी का नाम नहीं है, लेकिन राजनीति में अक्सर नाम से ज्यादा संकेत बोलते हैं। और संकेत साफ़ है समय को पहचानिए, भूमिका बदलिए। प्रकाश जोशी अपने तर्क को क्रिकेट से जोड़ते हैं। एक तरफ़ सुनील गावस्कर, जिन्हें भारतीय क्रिकेट का भीष्म पितामह कहा जाता है। दूसरी तरफ़ महेंद्र सिंह धोनी, जिन्होंने अपने चरम पर रहते हुए टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहा। यह तुलना सिर्फ़ खेल की नहीं है, यह समय की समझ की बात है। गावस्कर का उदाहरण यह बताता है कि महानता के बावजूद समय पर निर्णय न लेना टीम पर भारी पड़ सकता है। धोनी का उदाहरण कहता है कि पीछे हटना हार नहीं होता, बल्कि भूमिका बदलना भी नेतृत्व का हिस्सा होता है। राजनीति में यह तुलना अचानक नहीं आती। यह तब आती है जब पार्टी के भीतर कोई संवाद सीधे नहीं हो पा रहा हो। जोशी का बयान पढ़ते समय एक सवाल बार-बार आता है यह सलाह है या चेतावनी? क्या यह संदेश हरीश रावत के लिए है? या फिर यह पूरी कांग्रेस के लिए एक आईना है? राजनीति में रिटायरमेंट शब्द नहीं होता यह बात जोशी भी कहते हैं। लेकिन राजनीति में भूमिका परिवर्तन ज़रूर होता है। और शायद यही इस पूरे बयान का केंद्र है। जोशी अपने पोस्ट में उन नेताओं का ज़िक्र करते हैं, जो कभी अपने-अपने राज्यों में बेहद ताकतवर थे अजीत जोगी, कैप्टन अमरिंदर सिंह, कल्याण सिंह, उमा भारती, नारायण राणे, शंकर सिंह वाघेला। इन सभी नामों में एक समानता है पार्टी से बड़ा हो जाने का एहसास, और फिर पार्टी से अलग होने के बाद का संघर्ष। यह सूची सिर्फ़ इतिहास नहीं है, यह वर्तमान के लिए चेतावनी है। रामनगर सीट पर खींचतान, रंजीत रावत बनाम हरीश रावत, बीच में संजय नेगी यह सिर्फ़ टिकट का सवाल नहीं है। यह उस नेतृत्व का सवाल है जो 2027 की तैयारी कर रहा है। हरीश धामी पुराने जख्मों की याद दिलाते हैं। गणेश गोदियाल कहते हैं मामला सुलझ जाएगा।लेकिन भारतीय राजनीति में सुलझ जाएगा अक्सर सबसे लंबा चलने वाला वाक्य होता है। राजनीति में सबसे कठिन काम चुनाव जीतना नहीं होता। सबसे कठिन काम होता है समय को पहचानना। क्या कांग्रेस अपने भीतर इस समय को पहचान पा रही है? क्या वरिष्ठ नेता अपनी भूमिका खुद तय करेंगे या हालात उन्हें मजबूर करेंगे? और सबसे बड़ा सवाल क्या यह लड़ाई व्यक्तियों की है, या विचार और संगठन की? क्योंकि अगर यह सिर्फ़ व्यक्तियों की लड़ाई रह गई, तो 2027 आने से पहले ही बहुत कुछ पीछे छूट सकता है। कुल मिलाकर प्रकाश जोशी का बयान एक पोस्ट भर नहीं है। यह कांग्रेस के भीतर चल रही उस बहस का सार्वजनिक रूप है, जो अब तक बंद कमरों में थी। अब देखना यह है कि इस बहस का जवाब बयान से दिया जाएगा, या बदलाव से।

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