
न्यायालय का बहाना, सूचना पर ताला? क्यू-आर कोड, पुलिस और सूचना अधिकार पर उत्तराखंड आयोग की सख़्त नज़र
देहरादून। कभी-कभी लोकतंत्र की सबसे ज़रूरी लड़ाई किसी बड़े मंच पर नहीं, बल्कि फाइलों के ढेर और दफ्तरों की चुप्पी के बीच लड़ी जाती है। सूचना का अधिकार भी ऐसी ही एक लड़ाई है, जहाँ सवाल पूछना नागरिक का हक़ है और जवाब देना व्यवस्था की ज़िम्मेदारी। उत्तराखंड सूचना आयोग का ताज़ा फैसला इसी टकराव की एक अहम मिसाल है।
उत्तराखंड सूचना आयोग ने साफ़ शब्दों में कहा है कि कोई मामला यदि न्यायालय में विचाराधीन है, तो यह अपने-आप में सूचना देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकता। आयोग ने बदरीनाथ कोतवाली के लोक सूचना अधिकारी को चेतावनी देते हुए कहा है कि भविष्य में न्यायालय में मामला है का बहाना बनाकर सूचना के अधिकार में बाधा न डाली जाए।
राज्य सूचना आयुक्त कुशला नंद ने एक अपील की सुनवाई के बाद अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले की जांच जारी है और सूचना देने से जांच प्रभावित हो सकती है, तभी सूचना रोकी जा सकती है। लेकिन जहां जांच पूरी हो चुकी हो, वहां यह तर्क स्वीकार्य नहीं है कि मामला अदालत में है, इसलिए सूचना नहीं दी जाएगी। आयोग ने दो टूक कहा प्रकरण का न्यायालय से संबंधित होना, सूचना अधिकार के रास्ते में बाधा नहीं है।
यह मामला वर्ष 2023 का है, जब बदरीनाथ और केदारनाथ धामों में कपाट खुलने के दिन मंदिर परिसरों में क्यू-आर कोड वाले बोर्ड लगाए गए थे। इन क्यू-आर कोड के ज़रिए श्रद्धालुओं से दान करने की अपील की जा रही थी। सवाल उठे किसके खाते में दान जा रहा है? किसकी अनुमति से ये बोर्ड लगे? जवाब मिलने से पहले ही यह मामला राष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गया।
श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के तत्कालीन अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने प्रकरण की छानबीन कर बड़ी वित्तीय गड़बड़ी की आशंका जताई और बदरीनाथ थाने में एफआईआर दर्ज करवाई। मामला पुलिस जांच में गया, लेकिन पारदर्शिता के सवाल वहीं के वहीं रह गए।
सामाजिक कार्यकर्ता अनिल मोहन सेमवाल ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत चमोली पुलिस से क्यू-आर कोड प्रकरण में छह बिंदुओं पर जानकारी मांगी। बदरीनाथ थाने के प्रभारी कोतवाल, जो इस मामले में लोक सूचना अधिकारी भी थे, ने सिर्फ़ एक बिंदु पर एफआईआर की प्रति उपलब्ध कराई। शेष जानकारी देने से यह कहकर इनकार कर दिया गया कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
जब प्रथम अपीलीय अधिकारी से भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो सेमवाल ने राज्य सूचना आयोग का दरवाज़ा खटखटाया। और यहीं पर व्यवस्था से सवाल पूछने वाले नागरिक के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला आया।
सूचना आयुक्त कुशला नंद ने अपने आदेश में न सिर्फ़ सूचना अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, बल्कि यह भी कहा कि आरटीआई कानून की आत्मा को समझे बिना इस तरह के बहाने बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है। आयोग ने स्पष्ट चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
राज्य सूचना आयोग के इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए अजेंद्र अजय ने इसे स्वागत योग्य बताया। उन्होंने चमोली पुलिस के रवैये पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि पुलिस ने शुरुआत से ही मामले में ढीला रुख अपनाया है। उनके अनुसार, जब मामला आस्था, दान और सार्वजनिक धन से जुड़ा हो, तो पारदर्शिता सबसे ज़रूरी हो जाती है।
यह फैसला सिर्फ़ एक क्यू-आर कोड या एक एफआईआर तक सीमित नहीं है। यह उस प्रवृत्ति पर सवाल है, जहाँ मामला कोर्ट में है कहकर सूचना को रोका जाता है। सूचना आयोग ने याद दिलाया है कि न्यायालय और सूचना अधिकार, दोनों लोकतंत्र के स्तंभ हैं एक दूसरे के विरोधी नहीं। और शायद यही इस फैसले की सबसे बड़ी बात है सवाल पूछने के अधिकार को एक बार फिर, काग़ज़ों से निकालकर, संविधान की आत्मा से जोड़ देना।
