
राजेश सरकार
हल्द्वानी: हल्द्वानी से आई यह खबर सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, यह उस पूरे तंत्र की परतें खोलती है जिसमें शिक्षा अब सेवा नहीं, सौदा बन चुकी है। 46 निजी स्कूलों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। तीन दिन में जवाब देने को कहा गया है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि जवाब क्या आएगा सवाल यह है कि क्या यह जवाब सच होगा? जांच में जो सामने आया है, वह चौंकाने वाला कम और शर्मनाक ज्यादा है। स्कूल और बुक सेलर्स का गठजोड़। गठजोड़ यानि मिलीभगत यानी पहले से तय खेल।
अभिभावकों को मजबूर किया गया कि वे तय दुकानों से ही किताबें खरीदें। पर्चियां जारी की गईं स्कूल की तरफ से। यानी अब शिक्षा सलाह नहीं, आदेश बन चुकी है।
सोचिए, एक अभिभावक के पास विकल्प क्या बचता है? अगर वह मना करे, तो क्या बच्चे पर असर पड़ेगा? क्या उसे असहयोगी अभिभावक माना जाएगा? यही डर इस पूरे खेल की असली ताकत है। जांच में यह भी सामने आया कि एनसीईआरटी की सस्ती किताबों के साथ निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें जबरन थमाई जा रही थीं।
क्यों? क्या एनसीईआरटी की किताबें पर्याप्त नहीं हैं? या फिर असली मुनाफा उन प्राइवेट पब्लिशर्स में छिपा है? यहां शिक्षा नहीं, पैकेज बेचा जा रहा है। एक किताब पैकेज। जिसमें जरूरत कम, मुनाफा ज्यादा है। और यह सब ऐसे ही नहीं हो रहा। दुकानों से बरामद पर्चियां इस बात का सबूत हैं कि यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सिस्टम है। स्कूल तय करेगा कहां से खरीदना है। दुकान तय करेगी क्या बेचना है। और अभिभावक?
वह सिर्फ भुगतान करेगा। प्रशासन कह रहा है कि सीबीएसई के निर्देशों का उल्लंघन हुआ है। फीस स्ट्रक्चर वेबसाइट पर नहीं डाला गया। पारदर्शिता नहीं रखी गई। लेकिन सवाल यह है क्या इन नियमों का उल्लंघन आज हुआ है? या यह सालों से चलता आ रहा था और अब जाकर किसी को दिखा? स्कूल प्रबंधन सामने आया है। कहता है हम निर्दोष हैं। हमने दबाव नहीं बनाया। लेकिन अगर दबाव नहीं था, तो पर्चियां किसने जारी कीं? अगर सब पारदर्शी था, तो अभिभावकों को निर्दिष्ट दुकान का रास्ता क्यों दिखाया गया? अब एक नया तर्क दिया जा रहा है उत्तराखण्ड में एनसीईआरटी की किताबें महंगी बिक रही हैं। ठीक है, यह भी जांच का विषय है। लेकिन क्या इस तर्क के सहारे महंगी प्राइवेट किताबें थोपना जायज हो जाता है? क्या एक गड़बड़ी को छुपाने के लिए दूसरी गड़बड़ी को वैध ठहराया जा सकता है? यहां दोनों तरफ सवाल हैं। सरकार पर भी और स्कूलों पर भी। लेकिन फर्क सिर्फ इतना है सरकार से जवाब मांगना मुश्किल है, और स्कूलों से पैसा बचाना। इस पूरे मामले में सबसे खतरनाक बात है सामान्यीकरण। यानी यह मान लेना कि हर साल ऐसा होता है, तो इसमें गलत क्या है? गलत यह है कि शिक्षा को बाजार बना दिया गया है।
गलत यह है कि किताबें अब ज्ञान का माध्यम नहीं, कमीशन का जरिया बनती जा रही हैं। गलत यह है कि अभिभावकों की मजबूरी को बिजनेस मॉडल बना दिया गया है।और अगर इस पर भी कार्रवाई सिर्फ नोटिस तक सीमित रह जाती है, तो यह नोटिस नहीं, एक औपचारिकता होगी। तीन दिन का समय दिया गया। लेकिन यह मामला तीन दिन का नहीं है। यह सालों की चुप्पी का नतीजा है। अब देखना यह है क्या इस बार जवाब आएगा, या फिर एक और फाइल बंद हो जाएगी। क्योंकि जब शिक्षा व्यवस्था में पर्ची चलने लगे, तो समझ लीजिए किताबें नहीं, सिस्टम फेल हो चुका है।
