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दिनेशपुर में मिलावटी आयुर्वेदिक दवा के कथित कारोबार पर प्रशासनिक कार्रवाई के बाद उठ रहे गंभीर सवाल; मोबाइल नंबर, बैंक खातों और साइबर कड़ी की जांच पर भी सवालिया निशान

रुद्रपुर। दिनेशपुर में कथित वैद्य स्वरूप सिंह के ठिकाने पर प्रशासनिक टीम की छापेमारी के बाद लैब रिपोर्ट में दवा में एलोपैथिक दवा की मिलावट की पुष्टि और प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद इस पूरे प्रकरण में कई ऐसे सवाल खड़े हो गए हैं, जिनका जवाब अब तक सामने नहीं आया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कार्रवाई के दौरान अधिकारियों को कथित तौर पर उसके मोबाइल नंबर के गूगल-पे पर प्रतिदिन करीब तीन लाख रुपये के लेनदेन की जानकारी मिली थी, तो मोबाइल नंबर को जांच के लिए कब्जे में क्यों नहीं लिया गया?
सवाल केवल मोबाइल तक सीमित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक कथित वैद्य के बैंक खातों में करोड़ों रुपये जमा होने की जानकारी भी अधिकारियों के संज्ञान में थी। इसके बावजूद खातों को तत्काल फ्रीज या सीज कर वित्तीय लेनदेन की विस्तृत जांच क्यों नहीं कराई गई? यदि करोड़ों रुपये के लेनदेन और कथित मिलावटी दवा के कारोबार के बीच कोई संबंध था, तो उस आर्थिक नेटवर्क की पड़ताल जांच का अहम हिस्सा क्यों नहीं बनी?
छापेमारी के बाद दर्ज मुकदमों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इतने बड़े कथित कारोबार के सामने आने के बावजूद दिनेशपुर थाने में शुरुआती तौर पर केवल अवैध पिस्टल का मामला दर्ज होने और मिलावटी दवा से जुड़े आरोपों पर तत्काल प्राथमिकी न होने को लेकर भी अब सवाल उठ रहे हैं। बाद में लैब रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई आगे बढ़ी, लेकिन यह सवाल कायम है कि क्या मौके से बरामद सामग्री और अधिकारियों की अपनी जांच में सामने आई जानकारियां पर्याप्त नहीं थीं कि पूरे मामले की तत्काल आपराधिक जांच शुरू की जाती?

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हिरण के सींग मामले में भी सवाल

कथित वैद्य के घर से हिरण के सींग मिलने के बाद वन विभाग ने वन अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया। बताया जाता है कि रेंजर गौतम ने उसे बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया था, लेकिन स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर उसने बयान दर्ज नहीं कराए। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या उसके स्वास्थ्य संबंधी दावे की स्वतंत्र रूप से जांच कराई गई और आगे की कानूनी कार्रवाई क्या हुई?

डेढ़ करोड़ की साइबर ठगी से कड़ी क्यों नहीं जोड़ी गई?

अब इस मामले का एक और पहलू गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। जिस व्यक्ति के ठिकाने पर प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर बड़े पैमाने पर वित्तीय लेनदेन की जानकारी सामने आने की बात कही गई, उसी दौरान बाद में उसके खातों से करीब 1.52 करोड़ रुपये की साइबर ठगी का मामला सामने आया। पुलिस ने इस मामले में अलग से प्राथमिकी दर्ज की और एसटीएफ ने करीब 1.45 करोड़ रुपये फ्रीज कराए।

सवाल यह है कि क्या दोनों घटनाओं के बीच किसी संभावित वित्तीय कड़ी की भी जांच की गई? क्या प्रशासनिक छापेमारी के दौरान मिले मोबाइल, डिजिटल भुगतान, बैंक खातों और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड की जानकारी साइबर अपराध की जांच कर रही एजेंसियों के साथ साझा की गई? अगर नहीं, तो क्यों?

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क्या पीलीभीत से अब भी चल रहा है कथित कारोबार?

इस बीच जानकार सूत्रों का दावा है कि कथित वैद्य ने उत्तर प्रदेश के पीलीभीत क्षेत्र से कथित रूप से अपना कारोबार फिर शुरू कर दिया है और इसमें उसके दामाद का भाई भी कथित तौर पर सहयोग कर रहा है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि यह सूचना सही है तो यह केवल एक व्यक्ति पर कार्रवाई का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह सवाल बन जाता है कि छापेमारी के बाद कथित नेटवर्क की निगरानी क्यों नहीं की गई।

अब निगाह प्रशासन, पुलिस, औषधि विभाग और वन विभाग पर है। क्या जिम्मेदार अधिकारी बताएंगे कि छापेमारी के समय मोबाइल और बैंक खातों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? करोड़ों के कथित लेनदेन की जांच किस स्तर तक पहुंची? और क्या डेढ़ करोड़ रुपये के साइबर अपराध की जांच में इस पूरे प्रकरण की वित्तीय कड़ी को भी खंगाला जा रहा है? क्योंकि मामला सिर्फ मिलावटी दवा का नहीं है। मामला यह भी है कि अगर कार्रवाई के दौरान इतने गंभीर संकेत सामने आ गए थे, तो फिर जांच की दिशा उन संकेतों तक क्यों नहीं पहुंची?

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