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काशीपुर: कभी खेत सिर्फ अनाज उगाने की जगह हुआ करते थे। किसान मेहनत करता था, फसल काटता था और मंडी में बेचकर लौट आता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। अब खेती सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहती, वह बाजार तक पहुंचना चाहती है, ब्रांड बनना चाहती है और किसान की जेब में ज्यादा मुनाफा पहुंचाना चाहती है।
काशीपुर के कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित किसान गोष्ठी में खेती की नई तस्वीर दिखाई दी। चर्चा सिर्फ फसल उगाने की नहीं, बल्कि उसे ज्यादा कीमत दिलाने की थी। विषय था बासमती धान और मसाला उत्पादों का मूल्य संवर्धन एवं प्रसंस्करण।
कार्यक्रम में कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को समझाया कि सफाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और प्रसंस्करण जैसे छोटे बदलाव भी कृषि उत्पादों की कीमत कई गुना बढ़ा सकते हैं। विधायक त्रिलोक सिंह चीमा ने किसानों से तकनीक आधारित खेती अपनाने का आह्वान किया।
पंतनगर विश्वविद्यालय के डॉ. जितेंद्र क्वात्रा ने कहा कि ऊधम सिंह नगर की मिट्टी और जलवायु बासमती धान के लिए बेहद उपयुक्त है। वहीं विशेषज्ञों ने बताया कि ऑर्गेनिक खेती, संतुलित उर्वरक प्रयोग और आधुनिक तकनीकों से किसान निर्यात बाजार तक पहुंच सकते हैं।
धान की खेती में रोग नियंत्रण और आधुनिक तकनीकों पर भी विशेषज्ञों ने विस्तार से जानकारी दी। डॉ. निर्मला भट्ट ने धान की बीमारियों और उनकी रोकथाम पर किसानों को जागरूक किया, जबकि गन्ना अनुसंधान केंद्र के डॉ. संजय कुमार ने डीएसआर तकनीक को धान उत्पादन के लिए उपयोगी बताया।
उर्वरक प्रबंधन पर बोलते हुए एमके अजय प्रभाकर ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग की सलाह दी। उन्होंने साफ कहा कि अत्यधिक उर्वरक इस्तेमाल से धान की गुणवत्ता प्रभावित होती है और निर्यात योग्य स्तर बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
मसाला फसलों पर हुई चर्चा ने कार्यक्रम को और दिलचस्प बना दिया। डॉ. अनिल चंद्रा और डॉ. प्रतिभा सिंह ने बताया कि मसाले केवल स्वाद बढ़ाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति की मजबूत पहचान भी हैं। यदि मसालों का सही प्रसंस्करण और पैकेजिंग हो, तो किसान कच्चे उत्पाद की तुलना में कहीं अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
इस गोष्ठी ने साफ संकेत दिया कि अब किसान सिर्फ फसल नहीं उगाना चाहता, बल्कि अपने उत्पाद को बाजार में पहचान दिलाकर ज्यादा मुनाफा कमाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

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