
बिहार की राजनीति है, यहाँ कहानी कभी सीधी नहीं चलती। जब सब कुछ शांत दिखता है, तभी अंदर कहीं हलचल शुरू हो जाती है और इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
कई दिनों से खामोश दिख रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब फिर से अपने पुराने अंदाज़ में लौटते नजर आ रहे हैं। वही अंदाज़ जहाँ फैसले सीधे नहीं होते, बल्कि शर्तों के साथ आते हैं। पहले बिना शर्त राज्यसभा जाने की चर्चा ने राजनीति में भूचाल ला दिया। अपनी ही पार्टी में सवाल उठे क्यों जा रहे हैं? क्या वजह है? जवाब मिला इच्छा है। राजनीति में इच्छा कभी इतनी सरल नहीं होती। अब एक नई कहानी सामने आई है। कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने से पहले चार शर्तें रखी गई हैं। शर्तें भी ऐसी, जो सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि सत्ता के पूरे ढांचे को तय करती हैं। पहली नए मुख्यमंत्री का नाम पहले घोषित हो। दूसरी गृह मंत्रालय किसके पास होगा, यह साफ हो। तीसरी विधानसभा अध्यक्ष किस पार्टी का होगा। और चौथी कौन सा विभाग किसे मिलेगा। यानी इस्तीफा एक कागज़ नहीं, बल्कि एक समझौता होगा। एक ऐसा समझौता जिसमें सत्ता का हर पेंच पहले कसा जाएगा, फिर कुर्सी छोड़ी जाएगी।
यह वही बिहार है जहाँ चुनाव में चेहरा एक था, वोट उसी के नाम पर पड़ा था। अब वही चेहरा शर्तों के साथ हटने को तैयार है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि नया मुख्यमंत्री कौन होगा। सवाल यह भी है कि क्या यह बदलाव सहज होगा या फिर शर्तों की इस राजनीति में कोई नया विवाद जन्म लेगा। और अंत में, वही पुराना सवाल क्या बिहार में सत्ता बदलती है, या सिर्फ उसकी शैली?
