
खाड़ी संकट के बीच सरकार सख्त पीएनजी वालों को छोड़ना होगा एलपीजी, उत्तराखंड के 44 हजार से ज्यादा उपभोक्ता दायरे में
राजेश सरकार
देहरादून। जब दुनिया के नक्शे पर तनाव की लकीरें गहरी होती हैं, तो उसका असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहता वो हमारे रसोईघर तक पहुंचता है। ईरान और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। और अब इस संकट की आहट भारत सरकार की नई नीति में साफ सुनाई दे रही है। सरकार ने एक अहम फैसला लिया है अब एक उपभोक्ता के पास एक साथ एलपीजी और पीएनजी, दोनों कनेक्शन नहीं हो सकते। यानी अगर आपके घर में पाइप्ड गैस (पीएनजी) है, तो सिलेंडर (एलपीजी) को अलविदा कहना होगा। यह फैसला अचानक नहीं आया है। पहले पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक गजट नोटिफिकेशन जारी किया था, और फिर 14 मार्च को उसमें संशोधन कर इसे और सख्त बना दिया गया। अब तेल कंपनियों को साफ निर्देश है दोनों कनेक्शन रखने वालों को एलपीजी न दिया जाए, न रिफिल किया जाए, और जहां दोनों हैं, वहां एलपीजी कनेक्शन वापस लिया जाए। उत्तराखंड में यह फैसला सीधे 44,488 घरेलू पीएनजी उपभोक्ताओं को प्रभावित करेगा। आंकड़े जिलेवार देखे तो जनपद हरिद्वार में 25,600, उधम सिंह नगर में 16,088, देहरादून में 2,200, नैनीताल में 600 कनेक्शन इसकी जद में आयेंगे। ये आंकड़े बताते हैं कि अभी पीएनजी की पहुंच सीमित है, लेकिन सरकार की नजर में यही भविष्य है। प्रदेश में पीएनजी नेटवर्क अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है। केवल कुछ जिलों के चुनिंदा इलाकों में ही पाइपलाइन के जरिए गैस पहुंच रही है। लेकिन लक्ष्य बड़ा है साल 2031 तक सभी घरों तक पाइप्ड गैस पहुंचाने का। पांच कंपनियां इस काम में लगी हैं। मैदानी इलाकों में पाइपलाइन तेजी से बिछ रही है, लेकिन पहाड़ों में यह काम चुनौतीपूर्ण है। वहां की भौगोलिक परिस्थितियां विकास की रफ्तार को धीमा कर देती हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम एहतियात के तौर पर उठाया गया है। अगर भविष्य में एलपीजी की सप्लाई प्रभावित होती है, तो पीएनजी एक स्थिर विकल्प बन सकता है। साथ ही, दोहरे कनेक्शन की व्यवस्था को खत्म कर संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना भी इसका उद्देश्य है। यह फैसला जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं। क्या हर पीएनजी उपभोक्ता को निर्बाध सप्लाई मिल रही है? क्या पाइपलाइन हर इलाके में भरोसेमंद है? और सबसे बड़ा सवाल क्या उपभोक्ता के पास विकल्प बचता है? क्योंकि सिलेंडर सिर्फ ईंधन नहीं, एक बैकअप भी होता है।
फिलहाल जिम्मेदारी तेल कंपनियों को दी गई है कि वे इस आदेश को लागू करें। राज्य सरकार ने साफ किया है कि अगर उनसे सहयोग मांगा जाता है, तो वे मदद करेंगे।
लेकिन असली कहानी अब शुरू होगी जब उपभोक्ता इस बदलाव का सामना करेंगे। कुल मिलाकर नीतियां अक्सर बड़े नजरिये से बनती हैं, लेकिन उनका असर छोटे-छोटे घरों में महसूस होता है। रसोई की आंच अब सिर्फ गैस से नहीं, नीति से भी तय होगी। और सवाल वही रहेगा सुविधा ज्यादा जरूरी है या नियंत्रण?
उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में पीएनजी पहुंचाने की है योजना
भारत सरकार की नीति के तहत उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) पहुंचाने की योजना पर काम तेजी से चल रहा है। यह जानकारी खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग के अपर आयुक्त पीएस पांगती ने दी। उन्होंने बताया कि राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में पाइपलाइन कनेक्शन मैदानी जिलों के माध्यम से ही संभव होगा। इसी को ध्यान में रखते हुए पहले मैदानी इलाकों में ग्राउंड पाइपलाइन नेटवर्क का तेजी से विस्तार किया जा रहा है।
