
विकास की फाइलों में अटकी रकम: उत्तराखंड में 911 करोड़ अब भी खर्च का इंतज़ार, कुछ विधायक 90 प्रतिशत पार, कुछ 50 प्रतिशत से भी नीचे
राजेश सरकार
देहरादून से आई यह खबर सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें विकास के नाम पर आवंटित करोड़ों रुपये कागज़ों और फाइलों में घूमते रह जाते हैं, और ज़मीन पर काम अपनी गति से, या कई बार बिल्कुल ही नहीं चलता।
प्रदेश में मार्च 2022 में सरकार बनने के बाद दिसंबर 2025 तक विधायकों को विकास कार्यों के लिए कुल 1314 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध कराई गई। लेकिन इनमें से केवल 911.24 करोड़ रुपये (लगभग 69 प्रतिशत) ही व्यय हो पाए। यानी लगभग 402.75 करोड़ रुपये अब भी खर्च नहीं हो सके। यह आंकड़ा अपने आप में एक सवाल है क्या विकास की रफ्तार बजट की रफ्तार के साथ चल पा रही है?
सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत काशीपुर के अधिवक्ता नदीम उद्दीन को मिली जानकारी बताती है कि विधायकों की ओर से 1110.26 करोड़ रुपये के 44,854 प्रस्ताव दिए गए, जिनमें से 1095.14 करोड़ रुपये के 44,436 प्रस्ताव स्वीकृत भी हुए। लेकिन स्वीकृति के बावजूद खर्च का पहिया पूरी गति नहीं पकड़ सका। आंकड़े यह भी बताते हैं कि राज्य में विकास निधि का उपयोग एक समान नहीं है। सात विधायक ऐसे हैं जिन्होंने अपनी आधी निधि भी खर्च नहीं की, वहीं 15 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने 80 प्रतिशत से 92 प्रतिशत तक निधि का उपयोग किया है। इस असमानता में विकास की तस्वीर भी टुकड़ों में बंटी हुई दिखती है। कुमाऊं मंडल के 29 विधायकों को मिले 543.75 करोड़ रुपये में से 384.57 करोड़ (71 प्रतिशत) खर्च हुए। वहीं गढ़वाल में 41 विधायकों और एक नामित सदस्य को मिले 770.25 करोड़ रुपये में से 526.66 करोड़ (68 प्रतिशत) ही व्यय हो सके। इस तरह कुमाऊं के विधायक लगभग 159 करोड़ रुपये और गढ़वाल के विधायक लगभग 243 करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाए।
कुछ क्षेत्रों में निधि उपयोग की तस्वीर अपेक्षाकृत बेहतर रही जिनमें सितारगंज और नानकमत्ता 89 प्रतिशत, गदरपुर और हल्द्वानी 85 प्रतिशत, बागेश्वर 81प्रतिशत विकास कार्यो में विधायक निधि खर्च करने में आगे रहा वहीं चंपावत, लोहाघाट और बाजपुर जैसे क्षेत्रों में स्थिति कमजोर रही, जहां केवल 47 प्रतिशत निधि ही खर्च हो पाई। टिहरी इस सूची में सबसे नीचे दिखता है, जहां मात्र 30 प्रतिशत निधि व्यय हुआ है। वहीं ऋषिकेश (41 प्रतिशत), श्रीनगर (42 प्रतिशत) और यमकेश्वर (47 प्रतिशत) भी पीछे हैं। जबकि हरिद्वार 81 प्रतिशत, देहरादून 69 प्रतिशत, पौड़ी 66 प्रतिशत, चमोली और उत्तरकाशी 61 प्रतिशत, टिहरी 59 प्रतिशत, रुद्रप्रयाग 55 प्रतिशत का प्रदर्शन रहा। गढ़वाल क्षेत्र में ज्वालापुर और पिरान कलियर के विधायक सबसे आगे रहे, जिन्होंने 92 प्रतिशत निधि व्यय किया। मंगलौर (89 प्रतिशत), रुड़की और पौड़ी (88 प्रतिशत) भी बेहतर प्रदर्शन में रहे। यह रिपोर्ट सिर्फ यह नहीं बताती कि किसने कितना खर्च किया। यह यह भी पूछती है कि जब पैसा मंजूर है, प्रस्ताव पास हैं, तो विकास की गति आखिर क्यों अलग-अलग है? कहीं 90 प्रतिशत से ज्यादा खर्च, तो कहीं आधा भी नहीं यह अंतर सिर्फ प्रशासनिक दक्षता का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का भी संकेत है जिसमें विकास की गति समान नहीं है। और अंत में सवाल वही रह जाता है क्या विकास की यह निधि वाकई विकास में बदल रही है, या फिर फाइलों में ही विकास की कहानी पूरी हो जा रही है?
