
250 मरीजों पर 12 डॉक्टर, लेकिन पहाड़ के अस्पताल खाली, आखिर किसके लिए चल रही है यह व्यवस्था?
गणेश पाठक
हल्द्वानी: सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी की खबरें तो आपने बहुत सुनी होंगी। मरीज लाइन में खड़े रहते हैं, डॉक्टर नहीं मिलते। लेकिन हल्द्वानी के बीचों-बीच स्थित 50 बेड के आयुष अस्पताल की कहानी कुछ अलग है। यहां मरीजों से ज्यादा चर्चा डॉक्टरों की मौजूदगी को लेकर है। सवाल यह नहीं कि डॉक्टर कम हैं, सवाल यह है कि आखिर इतने डॉक्टर यहां क्यों हैं? जिस अस्पताल में औसतन प्रतिदिन लगभग 250 मरीजों की ओपीडी होती हो, वहां 12 डॉक्टर तैनात हैं। इनमें से 9 डॉक्टर स्थायी रूप से नियुक्त नहीं, बल्कि दूसरे अस्पतालों से अटैच किए गए हैं। सरकारी भाषा में इसे संबद्धीकरण कहा जाता है, लेकिन अस्पताल के गलियारों में इसकी दूसरी व्याख्या भी सुनाई देती है सुविधा के अनुसार पोस्टिंग। गौरतलब है कि आयुष अस्पताल से महज 50 मीटर की दूरी पर सोबन सिंह बेस अस्पताल है। वहां तस्वीर बिल्कुल उलट है। यहां हड्डी रोग और त्वचा रोग विभाग की ओपीडी में रोजाना 150 से अधिक मरीज पहुंचते हैं। लेकिन दोनों विभागों में केवल एक-एक विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात हैं। हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. पी.एस. खोलिया को चारधाम यात्रा ड्यूटी पर भेजा जा चुका है। वे सप्ताह में चार दिन ओपीडी और दो दिन ऑपरेशन करते थे। अब सवाल यह है कि जब एक अस्पताल में एक डॉक्टर 150 से अधिक मरीज देख रहा है, तब दूसरे अस्पताल में एक डॉक्टर के हिस्से महज 20 से 25 मरीज क्यों आ रहे हैं?
क्या स्वास्थ्य विभाग के पास डॉक्टरों की तैनाती का कोई वैज्ञानिक आधार है या फिर सब कुछ सुविधा और संपर्क के आधार पर तय हो रहा है? आयुष अस्पताल में दिन भर करीब 250 मरीज आते हैं। 12 डॉक्टरों में बांट दिया जाए तो प्रति डॉक्टर मुश्किल से 20-25 मरीज आते हैं।
अस्पताल सूत्रों के अनुसार कई बार डॉक्टर घंटों तक मरीजों का इंतजार करते रहते हैं। आरोप है कि पर्ची काउंटर पर बैठा स्टाफ मरीजों को कुछ चुनिंदा डॉक्टरों की ओपीडी में भेजता है। इसी वजह से अस्पताल के भीतर असंतोष बढ़ता जा रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि एक डॉक्टर ने जिला आयुर्वेदिक अधिकारी को लिखित शिकायत भेज दी। शिकायत में मरीजों के वितरण में पक्षपात और मनमानी का आरोप लगाया गया है। पत्र सामने आने के बाद अस्पताल के अंदर विवाद और तेज हो गया है। सरकारी अस्पताल में मरीजों को लेकर प्रतिस्पर्धा हो रही है। यह अपने आप में एक असामान्य स्थिति है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बेतालघाट, कालीखेत, भीमताल और नथुआखान जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के आयुर्वेदिक अस्पतालों से डॉक्टरों और कर्मचारियों को हटाकर हल्द्वानी में अटैच किया गया है। इन क्षेत्रों के अस्पताल पहले ही सीमित संसाधनों पर चल रहे थे। अब वहां डॉक्टरों की उपलब्धता और प्रभावित हो रही है। ग्रामीण मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। डॉक्टरों के अलावा दो फार्मासिस्ट, तीन स्वच्छक और तीन सफाई कर्मियों को भी आयुष अस्पताल में संबद्ध किया गया है। लालडांट स्थित आयुर्वेदिक चिकित्सालय का पूरा स्टाफ भी आयुष अस्पताल में समाहित कर दिया गया है। इसके बावजूद यदि प्रबंधन स्टाफ की कमी का तर्क दे रहा है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वास्तविक कमी कहां है अस्पताल में या व्यवस्था में? इस बाबत जिला आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ. एम.एस. गुंज्याल का कहना है कि आयुष अस्पताल में डॉक्टरों के पर्याप्त पद सृजित नहीं हैं। उनके अनुसार, अस्पताल में केवल दो पद स्वीकृत हैं, इसलिए सेवाओं को सुचारु रखने के लिए कुछ कर्मचारियों को अटैच करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि नए पद सृजित करने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है और न्यूनतम आवश्यक स्टाफ को ही संबद्ध किया गया है। कुल मिलाकर सरकारी फाइलों में यह महज प्रशासनिक व्यवस्था हो सकती है, लेकिन जमीन पर इसके असर अलग हैं। यदि पहाड़ के अस्पतालों से डॉक्टर हटाकर शहर में तैनात किए जा रहे हैं तो ग्रामीण मरीजों का क्या होगा? यदि 250 मरीजों की ओपीडी के लिए 12 डॉक्टर जरूरी हैं तो 150 मरीजों की ओपीडी वाले विभाग में केवल एक डॉक्टर कैसे पर्याप्त माना जा रहा है? और सबसे बड़ा सवाल क्या सरकारी अस्पताल मरीजों की जरूरत के हिसाब से चल रहे हैं या कर्मचारियों की सुविधा के हिसाब से? इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना होगा। क्योंकि यह केवल अटैचमेंट का मामला नहीं है, यह स्वास्थ्य सेवाओं के संतुलन और सरकारी जवाबदेही का भी मामला है।
