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लावारिसों का मसीहा खुद सिस्टम का शिकार, हरिद्वार अस्पताल बना लापरवाही का स्मारक

देहरादून/हरिद्वार: यह खबर किसी एक मौत की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जो फाइलों में जिंदा और हकीकत में सड़ चुकी है। हरिद्वार जिला अस्पताल की मोर्चरी में जो हुआ, उसने साफ कर दिया कि सरकारी सिस्टम में इंसान की कीमत जीवन में भी कम है और मौत के बाद तो और भी कम। लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर उन्हें सम्मान देने वाले लखन शर्मा आज खुद उसी सिस्टम की बेरुखी का शिकार बन गए। जिसने अनगिनत बेसहारा शवों को कंधा दिया, वही मौत के बाद मोर्चरी की बदहाल व्यवस्था में अपमानित हुआ। यह सिर्फ एक शव के साथ हुई लापरवाही नहीं, बल्कि शासन, स्वास्थ्य तंत्र और प्रशासन की सामूहिक नाकामी का नंगा सच है। 5 दिसंबर 2025 की शाम दिल का दौरा पड़ने से लखन शर्मा की तबीयत बिगड़ी। जिला अस्पताल हरिद्वार लाया गया, लेकिन जान नहीं बच सकी। रात होने के कारण औपचारिकताएं टल गईं। सुबह जब परिजन मोर्चरी पहुंचे, तो वहां का मंजर देख गुस्सा फूट पड़ा। शव की हालत ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। नतीजा अस्पताल में हंगामा, तोड़फोड़, सड़क पर धरना और अफसरों की घेराबंदी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी अस्पतालों में मृत शरीर भी सुरक्षित नहीं हैं? यह पहली बार नहीं हुआ। छह महीने पहले भी इसी मोर्चरी की बदहाली उजागर हुई थी। तब जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने 10 लाख रुपये के डीप फ्रीजर और सुधार के आदेश दिए थे। कागज चले, आदेश निकले, लेकिन ज़मीन पर न मशीन बदली, न व्यवस्था सुधरी। नतीजा वही खामोश सिस्टम, बंद निगरानी और खुली लापरवाही। अब मामला मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड पहुंच चुका है। मुजफ्फरनगर (खतौली) निवासी आरटीआई कार्यकर्ता नितिन सलूजा की शिकायत पर जिला अस्पताल हरिद्वार के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आर.वी. सिंह और मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आर.के. सिंह को पक्षकार बनाया गया है। डायरी नंबर मिल चुका है, फाइल खुल गई है। उधर जिलाधिकारी ने जांच के आदेश तो दे दिए, लेकिन 20 दिन बीतने के बाद भी कार्रवाई का कोई अता-पता नहीं। शायद यही सरकारी सिस्टम की पहचान है जांचें शुरू होती हैं, नतीजे कभी नहीं आते। सवाल यह नहीं कि गलती किसकी थी। सवाल यह है कि क्या एक और जांच से मोर्चरी सुधर जाएगी? क्या एक और रिपोर्ट से करुणा लौट आएगी? या यह मामला भी बाकी मामलों की तरह समय की धूल में दबा दिया जाएगा? लखन शर्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका मामला एक आईना छोड़ गया है। आईना उस समाज के लिए जो खबर पढ़कर आगे बढ़ जाता है, उस सिस्टम के लिए जो चेतावनियों को कागजों में दफन कर देता है और उस प्रशासन के लिए जो हर हादसे के बाद सिर्फ जांच के आदेश देना जानता है। आज सवाल यह नहीं कि लखन शर्मा के साथ क्या हुआ। सवाल यह है कि अगला लखन कौन होगा और क्या तब भी हम सिर्फ तमाशबीन बने रहेंगे?

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