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ऊँचापुल चौराहा: जब सड़क से बड़ा हो गया अतिक्रमण और सिस्टम जाम में फँस गया

हल्द्वानी नगर निगम क्षेत्र का ऊँचापुल कब एक मुख्य चौराहे में तब्दील हो गया, किसी को पता ही नहीं चला। लेकिन यह ज़रूर पता है कि इस चौराहे ने सुबह, दोपहर और शाम तीनों पहर लोगों की ज़िंदगी जाम कर दी है।
यहाँ जाम कोई अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की नियति बन चुका है।
सड़क के दोनों ओर दुकानदारों द्वारा किए गए अतिक्रमण ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि यातायात रेंगता हुआ दिखाई देता है। स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्र-छात्राएँ, दफ्तर पहुँचने की जल्दी में लोग सब इसी जाम में फँसे रहते हैं। सवाल यह है कि क्या किसी की जिम्मेदारी तय है?
चौराहे पर यातायात व्यवस्था के नाम पर पुलिस के सिपाही तैनात तो किए जाते हैं, लेकिन वे भी कुछ घंटों की औपचारिकता निभाकर चले जाते हैं। शहर की ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के उद्देश्य से बनाई गई सीपीयू आज चालान काटने की मशीन बनकर रह गई है। व्यवस्था सुधारने के बजाय काग़ज़ी कार्रवाई ज़्यादा नज़र आती है।
दिलचस्प बात यह है कि पुलिस महकमा समय-समय पर यातायात पखवाड़ा मनाकर जनता के बीच अपनी पीठ थपथपाने से नहीं चूकता। पोस्टर लगते हैं, भाषण होते हैं, लेकिन ऊँचापुल का जाम जस का तस बना रहता है। यही वजह है कि महानगर कहलाने वाला हल्द्वानी आज भी बदहाल यातायात व्यवस्था से जूझ रहा है।
अब बात करते हैं ऊँचापुल चौराहे पर लगने वाले जाम की असली वजह की। हल्द्वानी से रामनगर को जाने वाले इस मार्ग पर ऊँचापुल चौराहे के पास सड़क अचानक सिकुड़ जाती है। वजह साफ है एक ऐसी बिल्डिंग, जो कालांतर में अतिक्रमण कर बनाई गई। संबंधित विभाग ने हाल ही में किए गए सर्वे के बाद इस अतिक्रमणरूपी अवैध इमारत को हटाने के निर्देश भी दिए, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद वह बिल्डिंग आज भी जस की तस खड़ी है।
सूत्र बताते हैं कि इस बिल्डिंग के मालिक के सिर पर सत्ताधारी भाजपा के एक बड़े नेता का हाथ है। वरना सवाल उठता है कि कुछ माह पहले हल्द्वानी से ब्लॉक ऑफिस तक दोनों ओर के पक्के और कच्चे अतिक्रमण प्रशासन ने बिना हिचक ढहा दिए, लेकिन जैसे ही प्रशासन ऊँचापुल चौराहे पहुँचा, उसका पीला पंजा रेत और ईंट से बनी इस अवैध इमारत के सामने नतमस्तक हो गया।
आजकल शहर में उसी सत्ताधारी नेता की खूब चर्चा है जिसके नाम पर अतिक्रमण भी सुरक्षित है और सड़क भी असहाय। यहाँ सवाल बस इतना है कि क्या हल्द्वानी की सड़कों पर क़ानून सबके लिए बराबर है? या फिर कुछ इमारतें इतनी मजबूत होती हैं कि उनके सामने प्रशासन भी जाम में फँस जाता है? ऊँचापुल चौराहा आज सिर्फ़ ट्रैफिक जाम की कहानी नहीं है, यह सिस्टम के जाम होने की भी गवाही दे रहा है।

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