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सेल्फ डिफेंस के नाम पर वन्यजीव मारने का खुला संदेश? गढ़वाल डीएफओ की वैधानिक सूचना पर उठे गंभीर सवाल

देहरादून। उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष के बीच गढ़वाल वन प्रभाग की ओर से जारी एक सार्वजनिक सूचना ने पूरे वन महकमे में हलचल मचा दी है। वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा 11(2) का हवाला देते हुए जारी इस इश्तिहार में कहा गया कि कोई भी व्यक्ति आत्मरक्षा में किसी वन्यजीव को मारता या घायल करता है तो वह अपराध नहीं माना जाएगा। बस, फिर क्या था सूचना सामने आते ही विभाग के भीतर और बाहर बहस छिड़ गई। सवाल उठने लगे कि क्या यह कानूनी जानकारी थी या फिर वन्यजीवों के खिलाफ खुली छूट जैसा संदेश? दरअसल, पौड़ी जिले समेत गढ़वाल के कई इलाकों में गुलदारों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। हालात इतने खराब हैं कि शाम ढलते ही ग्रामीण घरों में कैद होने को मजबूर हैं। जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, लोग सड़कों पर उतर रहे हैं और वन विभाग के खिलाफ गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है।
वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी 2026 से 16 मई 2026 तक उत्तराखंड में वन्यजीवों के हमलों में 30 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 128 लोग घायल हुए हैं। सबसे ज्यादा मौतें गुलदार के हमलों में हुई हैं। वहीं बंदर और लंगूर के हमलों में सबसे ज्यादा लोग घायल हुए।
गढ़वाल डीएफओ की ओर से अखबारों और सार्वजनिक माध्यमों में जारी सूचना में साफ लिखा गया कि खुद की या किसी अन्य व्यक्ति की रक्षा में किसी वन्यजीव को मारना या घायल करना अपराध नहीं है और इसके लिए किसी अलग आदेश या अनुमति की आवश्यकता नहीं है। यहीं से विवाद शुरू हो गया। विभाग के कई अधिकारियों का मानना है कि सूचना की भाषा बेहद संवेदनशील थी और इससे आम लोगों में गलत संदेश जा सकता है। उनका कहना है कि ग्रामीण इसे कानूनी सुरक्षा कवच मानकर आक्रामक रवैया अपना सकते हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में आत्मरक्षा का प्रावधान जरूर है, लेकिन इसकी कानूनी प्रक्रिया बेहद जटिल है। यदि कोई व्यक्ति किसी वन्यजीव को मारता है तो बाद में उसे यह साबित करना पड़ता है कि घटना वास्तव में आत्मरक्षा की स्थिति में हुई थी। ऐसे मामलों में जांच होती है, परिस्थितियों का आकलन किया जाता है और कई बार लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यही वजह है कि विभाग के भीतर भी इस सूचना को अधूरी जानकारी और संवेदनशील चूक माना जा रहा है। इस मामले ने तूल पकड़ा तो वन मंत्री सुबोध उनियाल को भी सामने आना पड़ा। उन्होंने साफ कहा कि अधिकारियों को ऐसे मामलों में बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि वन विभाग की जिम्मेदारी केवल इंसानों की सुरक्षा नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण भी है। ऐसी किसी भी एडवाइजरी से बचना चाहिए जिससे जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो।
वन मुख्यालय ने भी पूरे मामले को गंभीरता से लिया है। प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) रंजन कुमार मिश्रा ने कहा कि आत्मरक्षा का अधिकार सब जानते हैं, लेकिन किसी घटना में सेल्फ डिफेंस साबित करना बेहद कठिन होता है। सूत्रों के मुताबिक अब गढ़वाल डीएफओ से जवाब तलब किया जा सकता है। साथ ही भविष्य में इस तरह की सूचनाओं को लेकर स्पष्ट गाइडलाइन जारी करने की तैयारी भी शुरू हो गई है।
कुल मिलाकर उत्तराखंड में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष अब केवल वन विभाग की चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। एक तरफ ग्रामीणों की सुरक्षा का सवाल है, दूसरी तरफ वन्यजीव संरक्षण की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी।
अब देखना यह होगा कि सरकार और वन विभाग इस नाजुक संतुलन को कैसे संभालते हैं क्योंकि जंगल का डर अब गांवों की चौखट तक पहुंच चुका है।

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