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दिनेशपुर से मोतीपुर तक नकली दवाओं और इलाज का काला कारोबार

रुद्रपुर: नगरों और कस्बों में इलाज अब सिर्फ अस्पतालों में नहीं हो रहा। इलाज अब उन कमरों में भी हो रहा है, जहां दीवारों पर भगवान की तस्वीरें टंगी हैं, अलमारी में रंग-बिरंगी शीशियां रखी हैं और बाहर बोर्ड लगा है हर बीमारी का गारंटी इलाज। लेकिन सवाल यह है कि क्या सचमुच इलाज हो रहा है या लोगों की जिंदगी के साथ सौदा? जनपद उधम सिंह नगर में बीते अप्रेल माह के बाद आज फिर जो कुछ सामने आया, उसने इस सवाल को और गहरा कर दिया है। अप्रेल माह की 21 तारीख को एक तरफ नकली आयुर्वेदिक दवाओं की फैक्टरी पकड़ी गई। वहीं आज दूसरी तरफ एक ऐसा युवक गिरफ्तार हुआ, जो सिर्फ 12वीं पास था लेकिन खुद को डॉक्टर बताकर लोगों का इलाज कर रहा था। और इन दोनों कार्रवाइयों के केंद्र में एक नाम बार-बार सामने आया एसडीएम ऋचा सिंह।
बीते 21 अप्रेल की शाम किसी फिल्मी दृश्य की तरह शुरू हुई। लेकिन यह फिल्म नहीं थी। यह असली जिंदगी थी, जहां बीमारी भी असली थी और धोखा भी। एक शिकायत डीएम कार्यालय पहुंचती है। शिकायत में कहा जाता है कि नगर पंचायत कार्यालय के पीछे मोतीपुर इलाके में नकली आयुर्वेदिक दवाओं का बड़ा कारोबार चल रहा है। ऐसी दवाएं जो शुगर ठीक करने का दावा करती हैं। ऐसी दवाएं जो ऑनलाइन देश-विदेश तक भेजी जा रही हैं। शिकायत के बाद प्रशासन हरकत में आता है। और फिर एसडीएम ऋचा सिंह एक योजना बनाती हैं। वह खुद शुगर की मरीज बनकर फैक्टरी पहुंचती हैं। न कोई मेडिकल जांच, न कोई पर्चा और न कोई डॉक्टर। बस 1300 रुपये दीजिए और इलाज का पैकेट ले जाइए। जैसे ही पैकेट हाथ में आया, पहले से तैयार पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने फैक्टरी पर दबिश दे दी। छापेमारी में जो मिला, वह किसी छोटे-मोटे फर्जीवाड़े की कहानी नहीं थी। दो मकानों में चल रही फैक्टरी से करीब 60 हजार पैकेट कथित शुगर कंट्रोल आयुर्वेदिक दवाओं के बरामद हुए। दवा बनाने की मशीनें मिलीं। दो हजार से ज्यादा खाली पैकेट और प्लास्टिक डिब्बे मिले। यानी बीमारी का इलाज नहीं, बीमारी का बाजार तैयार हो रहा था। दूसरे मकान से एलोपैथिक दवाओं की पेटियां मिलीं, विटामिन डी-3, कैल्शियम और अन्य दवाएं। इसके अलावा भारी मात्रा में खाली रैपर मिले।
रैपर यानी नकली पैकिंग का वह खेल, जो असली बीमारी से ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि मरीज को पता ही नहीं चलता कि वह दवा खा रहा है या धोखा। छापेमारी आगे बढ़ी तो कहानी और डरावनी हो गई। एक कमरे से सात हिरण के सींग बरामद हुए। वन विभाग मौके पर पहुंचा और सींगों को कब्जे में लेकर सील कर दिया। फिर एक अवैध पिस्तौल मिली। अब सवाल सिर्फ नकली दवाओं का नहीं था।
यह पूरा नेटवर्क किसका था? कहां तक फैला था? और किन लोगों की छत्रछाया में यह कारोबार चल रहा था? फैक्टरी संचालक स्वरूप सिंह कोई वैध लाइसेंस नहीं दिखा सका। पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर गोदाम सील कर दिया।
अप्रेल माह में हुई इस पहली कार्रवाई की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि दिनेशपुर थाना क्षेत्र से आज दूसरी खबर आ गई। यहां एक युवक खुद को डॉक्टर बताकर इलाज कर रहा था। लोगों को आयुर्वेदिक दवाएं दी जा रही थीं, लेकिन आरोप है कि उनमें एलोपैथिक दवाएं मिलाई जाती थीं।

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सोचिए, जिस मरीज को लगता था कि वह जड़ी-बूटी का इलाज ले रहा है, वह शायद बिना जानकारी के स्टेरॉयड या दूसरी दवाएं खा रहा था। स्थानीय लोगों ने लगातार शिकायत की। फिर स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम ने छापा मारा। जांच में पता चला आरोपी सिर्फ 12वीं पास है। लेकिन पिछले एक साल से डॉक्टर बनकर इलाज कर रहा था। क्लीनिक से बड़ी मात्रा में संदिग्ध दवाएं बरामद हुईं। सैंपल लैब भेजे गए हैं, डिग्री नहीं मिली। लाइसेंस नहीं मिला लेकिन मरीज मिलते रहे। क्यों? यह सवाल सिर्फ एक जिले का नहीं है, पूरे प्रदेश का है। गांवों और कस्बों में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी, महंगे निजी अस्पताल और लोगों की मजबूरी इन सबके बीच झोलाछाप डॉक्टर आसानी बनकर खड़े हो जाते हैं। वे घर के पास मिल जाते हैं। फीस कम लेते हैं और मरीज को तुरंत भरोसा दे देते हैं चिंता मत करो, ठीक हो जाओगे। लेकिन कई बार यही भरोसा जिंदगी पर भारी पड़ जाता है। हर छापेमारी के बाद कुछ दवाएं जब्त होती हैं, कुछ लोग गिरफ्तार होते हैं, कुछ दिन चर्चा होती है और फिर सब सामान्य हो जाता है। लेकिन असली सवाल वहीं खड़ा रहता है कि नकली दवाओं का कच्चा माल कहां से आता है? ऑनलाइन सप्लाई का नेटवर्क कौन चला रहा है? बिना लाइसेंस फैक्टरी महीनों तक कैसे चलती रही? स्वास्थ्य विभाग को पहले जानकारी क्यों नहीं मिली? और सबसे बड़ा सवाल मरीज आखिर किस पर भरोसा करे? इन दोनों मामलों में जिस तरह प्रशासन ने सीधे मौके पर पहुंचकर कार्रवाई की, उसकी चर्चा पूरे इलाके में है। खासतौर पर एसडीएम ऋचा सिंह की भूमिका को लोग अलग नजर से देख रहे हैं। क्योंकि अक्सर शिकायतें फाइलों में दब जाती हैं। लेकिन यहां अधिकारी खुद मरीज बनकर पहुंचे और फिर पूरा खेल सामने आ गया। कुल मिलाकर प्रदेश में बीमारी सिर्फ शरीर की नहीं है। एक बीमारी व्यवस्था में भी है जहां इलाज भी कारोबार बन जाता है। जहां दवा भरोसे से ज्यादा पैकेजिंग पर बिकती है और जहां डॉक्टर बनने के लिए कभी-कभी सिर्फ एक बोर्ड और कुछ शीशियां काफी होती हैं। लेकिन हर नकली दवा के पीछे एक असली मरीज होता है। और हर झोलाछाप इलाज के पीछे किसी की जिंदगी दांव पर लगी होती है।

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