
उत्तराखंड वन विकास निगम में करोड़ों के घोटालों पर कर्मचारी संघ का हमला
देहरादून। यह कहानी सिर्फ पैसों की नहीं है। यह कहानी उस सिस्टम की है, जहाँ संघ के शब्दों में घोटाला करो और सुरक्षित रहो का संदेश नीचे तक पहुँच चुका है। और अगर सवाल पूछो, तो निलंबन और तबादला तैयार मिलता है। उत्तराखण्ड वन विकास निगम में कथित तौर पर 20 से 25 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय अनियमितताओं का मामला कर्मचारी संघ ने सार्वजनिक मंच से उठाया है। उत्तरांचल प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में प्रदेश मीडिया प्रभारी राजेन्द्र सिंह राणा और प्रांतीय अध्यक्ष टी.एस. बिष्ट ने आरोप लगाया कि निगम में दोहरी नीति चल रही है छोटे कर्मचारियों पर सख्ती, बड़े अधिकारियों पर चुप्पी। राज्य गठन के बाद परिसंपत्तियों और दायित्वों के समायोजन में 2,18,64,513 रुपये का मामला सामने आया। संघ का दावा है कि जिनसे वसूली होनी थी, उनसे या तो आंशिक वसूली की गई या मामला लंबित रखकर सेवानिवृत्त होने दिया गया। एक अधिकारी पर 48,16,092 रुपये की वसूली बनती थी, लेकिन केवल 1,09,988 रुपये ही वसूले गए। बाकी 47,06,104 रुपये बट्टेखाते में डाल दिए गए। इसके उलट, मातवर सिंह ठाकुर नामक कार्मिक से 55,856 रुपये की वसूली कर ली गई जबकि उनके खिलाफ न पुलिस रिपोर्ट थी, न प्रत्यक्ष संलिप्तता सिद्ध हुई। संघ ने तंज कसा खीरे के चोर से वसूली, हीरे के चोरों को शाबाशी। संघ के अनुसार लालकुआं डिपो नंबर 4 और 5 में लगभग 10 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला हुआ। 4 अक्टूबर 2023 को वन मंत्री की बैठक में एसआईटी जांच के आदेश दिए गए, लेकिन अब तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई। डिपो नंबर 3 में 115 घन मीटर अतिरिक्त लकड़ी (करीब 20–25 लाख रुपये मूल्य) और 60 घन मीटर प्रजाति भिन्नता का मामला भी सामने आया। आरोप है कि आंतरिक समिति बनाकर प्रकरण को दबा दिया गया।
रामनगर क्षेत्र के विभिन्न प्रभागों में 1,11,26,010 रुपये के घोटाले का आरोप है। मई से अगस्त 2023 तक पत्राचार हुआ, कार्रवाई अब भी लंबित है। संघ का दावा है कि आवाज उठाने पर क्षेत्रीय अध्यक्ष को निलंबित कर स्थानांतरित कर दिया गया, बाद में उच्च न्यायालय से बहाली के आदेश आए। हरिद्वार खनन प्रभाग में वर्ष 2023-24 में 1,22,00,000 रुपये की अनियमितता का आरोप लगा।
2024-25 में विभिन्न खनन गेटों पर लगभग 57 लाख रुपये का मामला सामने आया। कार्रवाई? एक प्रभागीय प्रबंधक का तबादला, दो कर्मचारियों का निलंबन।
खासन प्रथम, खासन द्वितीय और कटेबड़ गेटों पर फरवरी 2025 तक क्रमशः 18,88,879 रुपये, 18,30,987 रुपये, 20,13,292 रुपये और संघ का दावा है कि 2025-26 में भी 50 से 60 लाख रुपये की नई अनियमितताएं सामने आई हैं। खनन नीति 2016 और 2020 के तहत वाहनों पर आरएफआईडी चिप अनिवार्य है। संघ का आरोप है कि कई वाहन बिना आरएफआईडी और बिना रवन्ने के चल रहे हैं। वाहन स्वामियों से शुल्क लिया जाता है, पर बैंक में जमा नहीं होता। संघ ने सीसीटीवी जांच और आरएफआईडी की सख्त निगरानी की मांग की है। संघ के अनुसार टौंस लॉगिंग प्रभाग में भी लगभग 8 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। आरोप है कि अधिकारियों द्वारा कर्मचारियों पर दबाव बनाकर अनियमितताएं कराई जाती हैं और बाद में जिम्मेदारी नीचे डाल दी जाती है। यहाँ सवाल य़ह उठता है कि पूरे मामलें में एसआईटी जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?, जिन अधिकारियों के खातों में रकम स्थानांतरित होने का आरोप है, उनके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं?, क्या स्थानांतरण ही कार्रवाई है?, क्या निलंबन ही न्याय है? संघ ने मांग की है कि सभी मामलों की एसआईटी या सीबीआई से निष्पक्ष जांच करायी जाए, दोषियों पर तत्काल एफआईआर और आपराधिक कार्रवाई हो, आरएफआईडी व सीसीटीवी की अनिवार्य निगरानी हो, कर्मचारी उत्पीड़न पर रोक लगे, लंबित देयकों का भुगतान किया जाए। प्रेस वार्ता में संघ नेताओं ने कहा निगम का पैसा डूब रहा है, कर्मचारी अदालतों के चक्कर काट रहे हैं, और घोटालेबाज संरक्षण में हैं। यह दोहरा मापदंड अब बर्दाश्त नहीं होगा। चेतावनी भी दी गई यदि शीघ्र निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। कुल मिलाकर यह खबर सिर्फ आरोपों की सूची नहीं है। यह उस भरोसे की कहानी है, जो टूटता है जब नियम सबके लिए समान नहीं रहते। अब निगाहें सरकार और जांच एजेंसियों पर हैं क्या सच सामने आएगा, या फाइलों में ही दब जाएगा?
