
त्योहार, शादी और सोना: भरोसे की परंपरा, सोने की चमक में छिपा खेल
हल्द्वानी। भारत में सोना सिर्फ़ धातु नहीं है, यह भरोसा है। बेटी की शादी हो, अक्षय तृतीया हो या दीवाली सोना ख़रीदना परंपरा है। मुश्किल वक्त में यही सोना गिरवी रखकर घर की ज़रूरतें पूरी की जाती हैं। गोल्ड लोन कंपनियां इसी भरोसे पर खड़ी हुईं हैं कम ब्याज, आसान कागज़ात और तुरंत नक़दी। लेकिन अब यही भरोसा एक नए खेल के निशाने पर है।
बाज़ार में सोने-चांदी के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। और जहां दाम बढ़ते हैं, वहां लालच भी बढ़ता है। अब गोल्ड माफिया ने ठगी का ऐसा तरीका अपनाया है जो साधारण जांच में पकड़ में नहीं आता।
खेल कुछ यूं है चांदी या दूसरी सस्ती धातु के ऊपर सोने की मोटी परत चढ़ाई जाती है। आभूषण दिखने में बिल्कुल असली कंगन, चेन, अंगूठी सब कुछ। ऊपर से चमक, वजन भी लगभग वैसा। लेकिन भीतर कहानी कुछ और।
गोल्ड लोन कंपनी के काउंटर पर जब ये आभूषण गिरवी रखे जाते हैं, तो पहली नज़र में कर्मचारी धोखा खा जाते हैं।
आम तौर पर सोने की शुद्धता जांचने के लिए आभूषण में हल्का कट लगाया जाता है। एसिड टेस्ट या मशीन से जांच की जाती है। लेकिन अब माफिया इतने शातिर हैं कि मोटी परत के कारण सतही कट में भी सोना ही नज़र आता है। कई कंपनियों ने अब ग्राहक की अनुमति से आर-पार कट लगाकर जांच शुरू की है। फिर भी हर बार सच्चाई सामने नहीं आती। असली खुलासा तब होता है जब लोन लेने वाला व्यक्ति किस्तें चुकाने नहीं आता, आभूषण लंबे समय तक अनक्लेम्ड पड़े रहते हैं, ऑडिट के दौरान गहन जांच होती है और तब पता चलता है कि गिरवी रखा गया सोना दरअसल प्लेटेड ज्वैलरी थी।
सूत्र बताते हैं कि यह जाली ज्वैलरी बड़े शहरों मुरादाबाद, हापुड़ और दिल्ली जैसे केंद्रों में तैयार हो रही है। इसे चार श्रेणियों में बांटा गया है ए केटेगरी में 65–70 प्रतिशत सोना होता है, बी केटेगरी में 55–60 प्रतिशत सोना होता है, सी केटेगरी में 40–50 प्रतिशत सोना होता है जबकि डी केटेगरी में 20–30 प्रतिशत सोना होता है।
गोल्ड लोन संचालकों का कहना है कि सबसे ज्यादा स्कैम ए और बी केटेगरी में हो रहा है। क्योंकि शुद्धता इतनी होती है कि शुरुआती जांच में शक कम होता है।
इस खेल का एक और पहलू है फर्जी दस्तावेज़। कुछ लोग मामूली पैसों के लालच में अपना आधार कार्ड और अन्य पहचान पत्र दे देते हैं। उन्हीं दस्तावेजों पर लोन उठाया जाता है। जब ठगी सामने आती है, तो वही व्यक्ति कानूनी कार्रवाई के घेरे में आ जाता है जिसने शायद आभूषण देखा तक नहीं।
गोल्ड लोन कंपनियों के संचालक जब शिकायत लेकर थाने पहुंचते हैं, तो उन्हें अक्सर यही जवाब मिलता है आपने पहले जांच क्यों नहीं की? सवाल यह है कि क्या ठगी की जिम्मेदारी सिर्फ पीड़ित की है? क्या कानून का काम सिर्फ सलाह देना है, या कार्रवाई भी करना है? पुलिस के इस रवैये से जहां कंपनियां खुद को असहाय महसूस कर रही हैं, वहीं ठगों के हौसले बुलंद हो रहे हैं।
सोना भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। छोटे शहरों में गोल्ड लोन कई परिवारों के लिए आर्थिक सहारा है। अगर इस क्षेत्र में विश्वास डगमगाता है, तो असर सिर्फ कंपनियों पर नहीं हजारों परिवारों पर पड़ेगा।
आज जरूरत है उन्नत जांच तकनीक की, कड़े नियामकीय प्रावधानों की, दस्तावेज़ दुरुपयोग पर सख्ती की और पुलिस-प्रशासन की सक्रिय भागीदारी की क्योंकि सोना चमकता है। लेकिन इस चमक के पीछे अगर मिलावट का अंधेरा फैलने लगे, तो नुकसान सिर्फ कारोबार का नहीं समाज के भरोसे का होता है। और सवाल वही है क्या हम इस भरोसे को बचा पाएंगे? या सोने की चमक में ठगी की परत और मोटी होती जाएगी?
